Followers

Sunday, June 17, 2012

कुछ लिखना है , ऐसा...

कुछ लिखना है , कुछ ऐसा , जो अब तक ना लिखा गया हो 
कुछ ऐसा , जो अब तक ना ही कहा गया हो , ना ही सुना गया हो 
कुछ ऐसा लिखना है,  जिसे पढ़ कर काम क्रोध मोह माया सब शांत हो जाएँ 
कुछ ऐसा लिखना है,  की "सपनों में ही ,  हकीकत वाली रात हो जाए 
............. चंद शब्दों में ही सारी बात हो जाए ||

कुछ लिखना है , ऐसा,  उस गरीब के लिए दो वक्त की रोटी जैसा 
कुछ लिखना है छोटा ..सुई की छेद की तरह ,
पर जिस का आकार हो ...हिमालय की चोटी जैसा |
कुछ लिखना है.. सीप में मोती जैसा ...
कुछ लिखना है , बंजर में बारिश की तलाश सा , समन्दर को मीठे पानी की प्यास सा 
कुछ लिखना  है , बूढी आँखों के लिए ...बेटे की आस सा
कुछ लिखना है मौत के लिए , जिन्दगी जैसा खास सा |  
कुछ ऐसा लिखना है की बंजर भूमि पर खुशियों की बरसात हो जाए  
ग़मों की आखरी रात हो जाए .....
......चंद शब्दों में ही सारी बात हो जाए ||

मेरे शब्दों को बेहद खास कर दे , 
आ इनमे अपने अहसास भर दे |

Saturday, May 26, 2012

लघु कथा :- महंगाई



पापा कितनी महंगाई है , और देखो , सरकारी अफसरों का महंगाई भत्ता बढ़ गया है , पापा कल मुझे अपने दोस्तों की पिक्चर दिखाने ले जाना है तो मेरी पॉकेट मनी भी जरा बढ़ा दो अब , और सुनिए जी मेरी किटी पार्टी वालों ने , घुमने जाने का प्लान बनाया है , तो मुझे भी इस बार दो हजार रुपये ज्यादा चाहिए | और हाँ एक नयी साडी तो बनती है, सेलरी बढ़ने की ख़ुशी में...क्यूँ बेटी ?
हाँ माँ , और मुझे भी नया मोबाइल चाहिये |

इतने में माँ का फ़ोन आता है , पिछले कई सालों से , माँ को सिर्फ पांच सौ रुपये महीने दिए जा रहें है , माँ को ख़ुशी हुई की बेटे की सेलेरी बढ़ गयी है , माँ ने फोन पर बेटे को बधाई दी , सेलेरी बढ़ने की | बेटे ने माँ को कहा ...माँ , इस महीने पांच सौ रुपये भेज नहीं पाऊंगा , थोडा खर्चा ज्यादा हो रहा है इस महीने , तू एडजस्ट कर लेना , माँ : - बेटा पिछले महीने भी तुने पैसे नहीं भेजे थे , और इस महीने तो सेलेरी बढ़ी है,

बेटा : माँ पैसे पेड़ पर नहीं उगते , सेलेरी बढ़ी है , तो महंगाई कितनी है , यहाँ तो बात - बात के पैसे लगते है , तुम्हरा दो लोगो का वहां खर्चा ही क्या है ?
नहीं इस महीने पैसे नहीं भेज सकता और फ़ोन काट दिया |

इधर उस बूढी माँ ने , साडी वाले से कहा, भैया पांच साडी ज्यादा दे दो , मै शाम तक फोल लगा कर भिजवा दूंगी , और वो हिसाब लगाने लगी की दस साडी की , फोल से , मिलने वाले 75 /- रुपये से दो दिन का गुजारा, तो हो ही जाएगा :)



******************************************************************
आज से हम इस ब्लॉग पर स्वरचित लघु कथाओं को जगह दे रहें है , लघु कथा नाम से टेग में आप को ये कहानियां पढने मिलेगी , आशा है आप इन कहानियों को पढेंगे और दिल से इसके दर्द को महसूस करेंगे , धन्यवाद :) आप के स्नेह  की अपेक्षा में हमेशा... :) 
दिल की कलम से ... 

तेरे बिना बेस्वाद जी जिन्दगी


तेरे बिना बेस्वाद जी जिन्दगी ...खाए जा रहा हूँ 
मै बस जीने की अपनी भूख, मिटायें जा रहा हूँ |
तुझ को देख  कर ...किया था वादा ...हमेशा मुस्कराने का 
बस वोही  अधूरी मोहब्बत ...अब तक ....निभाए जा रहा हूँ 
तेरे बिना बेस्वाद जी जिन्दगी ....खाए जा रहा हूँ |

चाँद को देखा नहीं , तेरे चेहरे को देखने के बाद
चांदनी रात में सिर्फ , तारों से काम चला रहा हूँ 
तेरे बिना बेस्वाद जी जिन्दगी ....खाए जा रहा हूँ |
यूँ अकेले अकेले जीना भी कोई  जीना है ? 
जिन्दा हूँ... खुद को भरमाये जा रहा हूँ 
तेरे बिना बेस्वाद जी जिन्दगी ...खाए जा रहा हूँ 
मै बस जीने की अपनी भूख, मिटायें जा रहा हूँ |

Monday, April 30, 2012

मजदूर या मजबूर दिवस



सर पर तगारी, या हाथ में फावड़ा 
हमेशा वो दिखा मुझे , धुप से लड़ता हुआ 
अपने से , चौगुना वजन लिए 
गर्म सडक पर नंगे पैर , सरपट बढ़ता हुआ | 
 
अपने पेट की अग्न को , शांत करने खातिर 
खुद से हमेशा लड़ता हुआ ..
वातानुकूलित भवनों में रहने वाले, लोकतंत्र से 
थोडा सहम थोडा डरता हुआ .. :(
इस महंगाई के महादानव से 
तिल तिल कर मरता हुआ |
हमेशा दिखा मुझे,  वो मजदुर , "मजबूर" 
मौत में जिन्दगी भरता हुआ ||

चाहें लग जाए सावन या चल रहा हो वसंत
पर हमेशा पतझड़ की तरह झरता हुआ |
मजदुर दिवस के दिन भी 
मजदूरी करता हुआ || 
मजदुर दिवस के दिन भी 
मजदूरी करता हुआ || 
 

Saturday, April 28, 2012

क्या कभी जीया है, ऐसा जीवन ?



क्या कभी किसी की आवाज में, नमी महसूस की है ? 
क्या तुमने जिन्दगी में , जिन्दगी की कमी महसूस की है ?
क्या महसूस हुआ है तुम्हे, किसी गैर का दर्द 
क्या बिताई है खुले आकाश में ,एक रात सर्द ?
क्या किसी के सपनों को, अपनी जमीं दी है ?
क्या किसी की आँखों को, खुशियों की नमी दी है ?
क्या किसी के पैर के छालों पर, मरहम लगाईं  है 
क्या किसी तन्हा को दी, प्यार की दवाई है ?
खुद रहतें हुए अंधेरों में , क्या किसी को दिए उजालें है ?
किसी और के गम क्या, कभी खुद ने संभालें है ?
क्या किसी पैर की , काटों की, चुभन महसूस की है ?
क्या खुले में तपते सूरज की, अग्न महसूस की है ?

"गर ऐसा कुछ महसूस नहीं किया है 
तो प्यारे,
अब तक तुने जीवन ठीक से नहीं जीया है "|| 
 
केलेंडर के बदलते पन्नों के माफिक, जिन्दगी बिताई है 
तुने बस जिन्दा रहने की , एक रस्म निभाई है ||

Saturday, April 21, 2012

अर्जियां मेरी ..

 लिखी सौं अर्जियां.. , 
उसके दर तक , 
एक भी , भेजी  जा ना सकी |
मुरादें मेरी ...
उसके दर से ..
पूरी हो कर , आ ना सकी |

उसे यकीन था ...वो मुझे ...इतना तोड़ देगा 
की मैं हाथ फैलाये , उसके  दर तक चला आऊंगा ...!
पर हमसे हमारी खुशियाँ , कभी मांगी ना जा सकी |
वो पत्थर का ही  था , यह भी साबित हुआ 
दिल की बातें ...उसके कानों तक जा ना सकी ||
मुरादें मेरी ...उसके दर से ...पूरी हो कर आ  ना सकी | 

वो लेता रहा सब्र का  इम्तेहां मेरे ...सरे आम 
पर हमसे जिन्दगी से चीटिंग की ना जा सकी 
ग़मों में भी हम , खुल के  मुस्कराते रहे 
आसुओं की महफ़िल हमें कभी आजमा ना सकी |
 
लिखी सौं अर्जियां.. ,
 उसके दर तक ....
एक भी , भेजी  जा ना सकी |

Monday, April 2, 2012

बचपन बचाओ :)



बचपन कैद रहिसों के मकानों में
रसोई में झूठे बर्तनों से ,खिलोने खेल रहें है
वो  गरीबी का भारी बोझ...
अपने कोमल कन्धों पर झेल रहें है |

लोग  देश के भविष्य को , कूड़ें में फेक रहें है |
सब मूक बन कर , नेहरु के गुलाब को
टुकड़ा टुकड़ा, बिखरते देख रहे है |
समाज चुप है , चुप सरकारें भी है
सब बचपन की लाश पर, अपनी रोटियां सेक रहें है |

बचपन यदि सही पल्लवित नहीं हुआ
तो एक सभ्य समाज , कैसे बना पाओगे ?
बचपन यदि बिगड़ा , अपना घर कैसे बचाओगे ?
समय है बचपन को सँभालने का ,
इस गुलाब को... महकती बगिया में ढालने का ||
Related Posts with Thumbnails