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Monday, December 26, 2011

वो अपनी उम्र से कुछ ज्यादा, बड़ी सी लगती है ||


वो अपनी उम्र से कुछ ज्यादा, बड़ी सी लगती है
उसके जीवन में खुशियों की, कमी सी लगती है |
मुस्कराती है ज़माने को, दिखाने के खातिर
अन्दर उसके , आसुओं की झड़ी सी लगती है
वो अपनी उम्र से कुछ ज्यादा, बड़ी सी लगती है ||

उसका बचपना छूट गया, जवानी की दहलीज पे
ज्यादा दिन टिक ना सका, यौवन का खुमार..|
कभी खुद लापरवाह , कभी रिश्ते बेपरवाह
जिन्दगी अब उसकी, मज़बूरी सी लगती है ..|
वो अपनी उम्र से कुछ ज्यादा, बड़ी सी लगती है ||

किसी की नफरत ने , उसे बड़ा बना दिया |
किसी की फितरत ने, उसे बड़ा बना दिया |
आसुओं को पीती रही , गमों को सीती रही
अपने दर्द को उसने , हमेशा हँसी में उड़ा दिया |

वक्त बेवक्त भीगी पलकें ,अश्कों को उसकी, मंजूरी सी लगती है
वो अपनी उम्र से कुछ ज्यादा , बड़ी सी लगती है ||

Tuesday, December 20, 2011

वक्त आ गया है ... हैप्पी विंटर


वक्त आ गया है ...
उस महरूनी स्वेटर, को फिर से बनाने का
मुन्ना को सर्दी से बचाने का ||
वो दो - बटा चार के फंदे, सलाइयों में डालने का
पुरानी पड़ी ऊन, को सँभालने का ||

वक्त आ गया है ...
वो उसका ऊन के गोले को , मुझ से दूर ले जाना
उसको समेटते, समेटते , उसका मुझमे समा जाना ||
ऊन में पड़ चुकी , उलझनों को सुलझाने का
मासूमियत से रिश्ते निभाने का ,
फिर वक्त आ गया है ...;) वक्त आ गया है ...;) ||

रिश्तों में गर्माहट लाने का , मीठी धुप को कतरें कतरें तक पहुँचाने का
तिल , रेवड़ी , गजक , गर्म गाजर का हलवा खाने का
वक्त आ गया है ...;) ||

अब आप भी ग़मों को खोल कर , छत पर सुखा दो
अपनी खुशियों को थोड़ी हवा लगा दो
वक्त आ गया है सीलन को मिटाने का , दुखों को अलाव में जलाने का
जीवन से कड़वाहट मिटने का , अपनों को करीब लाने का
वक्त आ गया है ...;) ||वक्त आ गया है ...;) ||

happy winters ||

मैंने देखा इस साल में .....2011



मैंने देखा इस साल में .....
नेताओं को तिहाड़ जेल में आराम फरमाते , आतंकवादी को राजकीय अतिथि सा सम्मान पाते
मैंने वर्ल्ड कप को अपने हाथ में देखा , पूरे देश को अन्ना के साथ में देखा |
मैंने किंगफिशर का नशा उतरते देखा , सोने को तेजी से चढ़ता देखा |
मैंने खून से सनी मुंबई देखी ... देखी, खून से सनी दिल्ली
आम जन मरतें रहें ... और नेता ...बैठे रहें बन के भीगी बिल्ली ||

मैंने देखा इस साल में ...
गरीब के साथ साथ , मिडल क्लास को भी रोते हुए ... सरकार को कान में रुई डाल के सोते हुए |
मैंने महंगाई की मार देखी .... मैंने भूख से हाहाकार देखी |
मैंने संसद में सिर्फ हंगामा और बहस देखी , मैंने किसान की जमीं पर कार रेस देखी |
मैंने रामलीला में लोकतंत्र को पिटते देखा ... नारी की इज्जत को सरे आम लुटते देखा |
राजनेताओं को लगा "भंवरी" का रोग देखा ... "सीबीआई" का बेजा दुरूपयोग देखा ||
मैंने "ममता" को मिलते राज देखा .... "सुशिल कुमार" को पहने ताज देखा |
मैंने देखी हत्या पत्रकार की ... सूरत देखी घोटालों वाली सरकार की |

मैंने देखा इस साल में ....
मेरे "अपनों" को हमेशा के लिए जुदा होते हुए ....उनकी याद में हर एक को रोते हुए :(
मैंने देखा हर दिल अजीज शम्मी कपूर को जातें हुए .... उस जवान आदमी(देवानंद ) को भी लोगो को रुलाते हुए |
मैंने रुआंसी गजल(जगजीत सिंह ) देखी ...... नविन (नविन निश्चल) के लियें आँखें सजल देखी |
दो उस्तादों को आखरी सलाम देखा | (भूपेन हजारिका / उस्ताद सुल्तान खां )
प्रधानमंत्री की होड़ में , सब से उपर मोदी का नाम देखा |

इस साल मैंने जिन्दगी का हर उतार चड़ाव देखा , हर महीने पेट्रोल का एक नया भाव देखा ||
मैंने जनता का लोकतंत्र के गाल पर तमाचा देखा..उन्नति का, "खाली कागजों" में सरकारी खांचा देखा |
अब बस गुजारिश ऊपर वाले से इतनी, की या तो , इस राजनीती को वो खुद संभालें |
या फिर हम को भी अब अपने पास बुलाले | :)
इस महंगाई में , भ्रष्ट तंत्र में अपना दम घुटता है ...
बच्चों की छोटी फरमाइश के आगे भी , अब अपना सर झुकता है |
इस साल महंगाई ने , अपनी कमर भी तोड़ डाली है ,
कैसे मनाऊं जश्न नये साल का , मेरी दोनों जेबें खाली है :(

Tuesday, November 29, 2011

बैठ जाइए बैठ जाइए (आम आदमी पार्ट २)


बैठ जाइए बैठ जाइए बैठ जाइए
इस देश को हम कभी, खड़ा होने नहीं देंगे
जिन्दा लाश बना देंगे, आम जन को
किसी को कब्र में भी चैन से सोने नहीं देंगे |
बैठ जाइए बैठ जाइए बैठ जाइए ||

आप बैठते है तो ,पेट्रोल ऊँचा चड़ता है
आरक्षण का आक्रोश बड़ता है
सरकारी गोदामों में अनाज सड़ता है
भूख से बिलख के आम आदमी मरता है |
यहाँ बैठने वालों से,हर आदमी डरता है |
गांधी भी इस खादी से, दहशत में आहें भरता है ||
बैठ जाइए बैठ जाइए बैठ जाइए ...

जनता की आह को, हम यहाँ ,शौर में दबा देंगे
उनकी खून पसीने की कमाई को , हगामें की भेट चड़ा देंगे |
और फिर भी जागी रही जनता, तो उन्हें आपस में लड़ा देंगे
झूठे केस बना बना उन्हें ताउम्र, जेल में सडा देंगे |
बैठ जाइए बैठ जाइए बैठ जाइए ...

यहाँ के लोकतंत्र में ,जनता का अब भी विश्वास है
चाहें हम लोगो के मन में, सिर्फ विष का ही वास है
बैठ जाइए बैठ जाइए बैठ जाइए
इस देश को लूटने के लिए,समय सब को दिया जाएगा
अरबों के घोटालों का हिसाब भी. नहीं लिया जाएगा |
यह लोकतंत्र , "लोक" के लिए नहीं, नोट के लिए बना है
बैठ जाइए यहाँ जनता की हित की बात करना, सख्त मना है |

Wednesday, November 23, 2011

दूसरी गजल


उम्मीदों की सड़क नहीं मिलती , खुशियों का आसमां नहीं मिलता
यहाँ किसी को अपने , सपनों का जहां नहीं मिलता ?
तुम कहते हो, क्यूँ मरे जा रहें हो ?
प्यारे इस महंगाई में, जिन्दा रहने का, "सस्ता" सामान नहीं मिलता |

उसने भेजा था धरती पर , तब में सिर्फ इंसान था
अब मजहबों में बांटा दिया गया ,
उसकी धरती पर हर लाश को , शमशान नहीं मिलता |

देर तक जिन्दा रहते है अक्सर वो , जिनकी मौत का इंतजार होता है सब को
और जिस का इंतजार होता है घर पर रात भर ,सुबह तक वो इंसान नहीं मिलता |

कहतें है आदमी की जान का दुश्मन, खुद आदमी है यहाँ
पर किसी शख्स के चेहरे पर, खतरे का निशान नहीं मिलता ?

गम मुकम्मल मिलतें है , दर्द मुकम्मल मिलतें है
बस मुक्कमल ईमान नहीं मिलता |

मैं लिख देता हूँ चाँद , तारें, किसी की भी जिन्दगी में
पर मुझे दो वक्त की रोटी का, इनाम नहीं मिलता ||

उम्मीदों की सड़क नहीं मिलती , खुशियों का आसमां नहीं मिलता
यहाँ किसी को अपने , सपनों का जहां नहीं मिलता

गजल ..


तुम हमें क्या रुलाओगे , ?
आंसू हमारी और आते आते , खुद ही मुस्कराने लगतें है |

हम चाँद को छेड़ देतें है , सूरज के सायें में
तुमको अब भी , हम सयाने लगतें है ?

दर्द की बात मत करना, ना ही जख्म देना हसीं कोई
जब गम होतें है ज्यादा दिल में , हम लोगो को हँसाने लगते है |

मुझे याद करना हर पल , मैं हिचकियो से घबराता नहीं
पर मुझे याद ना आना , हमें भूलने में ज़माने लगतें है |

मेरी तस्वीर देख कर , अपना इरादा बदल ना लेना
हम सूरत से , कुछ पागल दीवाने लगतें है |

तुम फूल हो, तो हमे fool बनाने की, गुस्ताखी ना करना
हम मूडी है , जब मन किया, खुद को ही सताने लगते है |

तुम बाग़ में रहों या घने जंगल में , परवाह किसे है ?
जब मन भर जाएँ फूलों से , हम काटों से रिश्तें बनाने लगते है |

तुम हमें क्या रुलाओगे , ?
आंसू हमारी और आते आते , खुद ही मुस्कराने लगतें है

Thursday, November 17, 2011

जरा समय निकाल कर आ ...


तेरे मेरे दरमयां कुछ बातें , अधूरी पड़ी है
जरा समय निकाल कर आ
थोड़े मेरे "लफ्ज" ले जा ,थोड़े अपने "गम" दे जा ||

बामुश्किल खुशियाँ जोड़ी है, तेरे इंतजार में
जरा समय निकाल कर आ
मुझे आंसू दे जा , अपनी खुशियाँ ले जा ||

कुछ त्यौहार अधूरे पड़े है , तेरे इंतजार में
जरा समय निकाल कर आ
अपने पीने की वजह ले जा , मुझे जीने की वजह दे जा ||

उन गलियों में , हमारे कुछ पुराने किस्से रखें है
कुछ इल्जाम तो ले लिए मैंने अपने सर
बाकी कुछ तेरे हिस्से रखें है |
जरा समय निकाल कर आ
अपना इनाम ले जा, मुझे और इल्जाम दे जा ||

पिछली बात का जख्म , अब भी हरा है
आँखों में, आसुंओं का ,समन्दर भरा है
उन जख्मों को कुरेदने के बहाने आ
अपन हक ले जा , मुझे और जख्म दे जा |

तेरे मेरे दरमयां कुछ बातें , अधूरी पड़ी है
जरा समय निकाल कर आ

Friday, November 11, 2011

दो चम्मच प्यार...




दो चम्मच प्यार चाहिए उसे
चाहे तो कॉफ़ी के , कप में मिला दो
या फिर ...
आज , चाय अपने हाथ से, बना के पिला दो...
उसकी थोड़ी सी मदद कर दो , आटा गुन्दने में आज
आज थोडा शायराना , कर लो अपना मिजाज
आज उसके खाने की, जम कर तारीफ़ कर दो
आज उसके चेहरे पे , दो चार हसीं शेर गड़ दो

आज दो पल फुरसत के निकाल के सिर्फ उसकी सुनो
आज उसके दामन से थोड़े गम चुनों |

आज अहसास कराओ, उसे उसकी अहमियत
आज पूरी , उसकी ये छोटी सी हसरत कर दो |
उसके जीवन का एक पल , खुशनुमा अहसास से भर दो ॥

ना उसे आप का बैंक बैलेंस चाहिए , और ना ही आप की जिन्दगी
उसे चाहिए सिर्फ और सिर्फ "दो चम्मच" ज्यादा प्यार ...|

Thursday, October 27, 2011

दिल जली दिवाली


वो दोस्तों के साथ मनाता रहा जश्न सारी रात ,
मैं करवट बदल के रात बिताती रही
उसे पसंद था अँधेरा.... ताउम्र " विजय " ,
मैं एवई दीप जलाती रही ||

वो बांटता रहा खुशियाँ, गेरों के साथ दिवाली की
मैं खुद से ही, दिल को मनाती रही ||
वो करता रहा रोशन, गैरों के दीये
मैं यहाँ अकेले , अपना दिल जलाती रही ||
होगी लोगों के लिए खास, यह अमावस की रात
मैं तो हर रात, अमावस मैं बिताती रही ||

जिसें दिया था हक़,सात जन्मों का मैंने
वो एक दिन के लिए भी, मेरा हो ना सका |
वो लुभाता रहा, किसी और को अपने प्यार से
मैं शादी की तस्वीरों से, खुद को लुभाती रही ||

मेरे दिल का दीया बुझ गया
तेरे प्यार की कमी से , कब का |
मै सिर्फ रस्म निभाने के लिए
त्यौहार बनाती रही ||
उसे पसंद था अँधेरा.... ताउम्र " विजय " ,
मैं एवई दीप जलाती रही ||

Thursday, October 20, 2011

माँ मज़बूरी


माँ की दवाई का खर्चा, उसे मज़बूरी लगता है
उसे सिगरेट का धुंआ, जरुरी लगता है ||

फिजूल में रबड़ता , दोस्तों के साथ इधर-उधर
बगल के कमरे में, माँ से मिलना , मीलों की दुरी लगता है ||
वो घंटों लगा रहता है, फेसबुक पे अजनबियों से बतियाने में
अब माँ का हाल जानना, उसे चोरी लगता है ||

खून की कमी से रोज मरती, बेबस लाचार माँ
वो दोस्तों के लिए, शराब की बोतल, पूरी रखता है ||
वो बड़ी कार में घूमता है , लोग उसे रहीस कहते है
पर बड़े मकान में , माँ के लिए जगह थोड़ी रखता है ||

माँ के चरण देखे , एक अरसा बीता उसका ...
अब उसे बीवी का दर, श्रद्धा सबुरी लगता है ||
माँ की दवाई का खर्चा, उसे मज़बूरी लगता है
उसे सिगरेट का धुंआ, जरुरी लगता है ||

Sunday, October 16, 2011

मै तेरे शहर में नया हूँ ...|

मै तेरे शहर में नया हूँ
इसकी आबो हवा में, मुझे घुल जाने दे
मैं खुद से, खुद का, पता जानने निकला हूँ
मुझे किस्मत को आजमाने दे ||

सुना है अलग है तेरा, शहर मेरे शहर से
पर चाँद और सूरज का ठिकाना तो वोही है ?
लोग होंगे पराये , परवाह किसे है ?
मुझे चाँद सूरज से ही, रिश्ते निभाने दे ||

मै तेरे शहर में नया हूँ
इसकी आबो हवा में, मुझे घुल जाने दे ||

बड़े तहजीब का शहर है तेरा
यहाँ "सर" कह कर लोग, घर में घर कर लेते है
मुझे भी सर छुपाने के लिए, इक सर बनाने दे ||

मै तेरे शहर में नया हूँ ..
इसकी आबो हवा में, मुझे घुल जाने दे ||

तेरे शहर के लोग बड़े अजीब है...
अपनों से दूर है , अजनबियों के करीब है॥||

यहाँ तारुफ़ करने का, तकल्लुफ कोई नहीं करता...|
क़ानून को हाथ में लेने से भी कोई नहीं डरता |
क्यूंकि जिस की जेब मैं जितना पैसा, उतना वो शरीफ है |
गरीबी का जुर्म माथे पे मेरे भी, अबकी मुझे भी शराफत कमाने दे ||

मै तेरे शहर में नया हूँ
इसकी आबो हवा में, मुझे घुल जाने दे

Friday, September 30, 2011

नारी की, नवरात्रा कब आएगी...


नौं दिन कन्याओं को, घर खाना खाने बुलातें है
और अध्जन्मी कन्या को, हम कूड़े में फेक आते है ||

एक नारी को ही हम, अम्बे, काली,दुर्गा, माता कहतें है
और बीच चौराहे, नारी की इज्जत लूट लेतें है ||

नौ दिन कन्याओं, की पूजा करतें है
पर उसे नौ महीने, गर्भ में नहीं सह्तें है
माता का मंदिर बनाते है,उसके दर्शन करने, पैदल चल कर जातें है
पर एक कन्या को , जन्म देने से घबरातें है ||

आप नौं दिन में पूजा कर के, किस माता को मना लोगे ?
गर कन्या नहीं रही धरती पर , तो क्या पुरूषों से काम चला लोगे ?
कन्याओं को मार के गर्भ में , कैसे माँ का आशीर्वाद पा लोगे ?
पाखंड की धार्मिक क्रियाओं से, कब तक समाज बचा लोगे ?

ना जाने "नारी की नवरात्रा" कब आएगी...
कब मंदिरों के बाहर, घर घर में नारी पूजी जायेगी ?
व्रत, उपवास, पूजा कर, उपरवाले को भरमातें है |
ऐसे रीती रिवाज़ और बनावटी समाज से , हम कतराते है
ऐसे ढोंगी समाज सुधारकों को, हम दूर से ही शीश नवातें है ||

नौं दिन कन्याओं को, घर खाना खाने बुलातें है
और अध्जन्मी कन्या को, हम कूड़े में फेक आते है ||

Friday, September 23, 2011

तेरे ग़मों में, डूब के लिखता हूँ...


मैं जब भी तेरे ग़मों में, डूब के लिखता हूँ
लोग कहते है ....वाह... क्या खूब लिखता हूँ ||
तेरे आंसुओं से, शब्दों को सींचा है
तेरे दर्द को दिल से समझा है
हर शब्द बयाँ करते है, खालिस सच्चाई
कोई साबित तो करें, की झूट लिखता हूँ !
मैं जब भी तेरे ग़मों में, डूब के लिखता हूँ
लोग कहते है ....वाह क्या खूब लिखता हूँ ||

मैं ग़मों का व्यापारी नहीं हूँ,
दांव लगाऊं तेरे दर्द का , कोई जुआँरी नहीं हूँ
मैं रोती रातों को "अमावस",खुशियों की कमी को "भूख" लिखता हूँ
अकेलेपन को "अँधेरा" , भीगी पलकों को, "गीली दूब" लिखता हूँ
किसी को अच्छा लगे या बुरा , मैं सिर्फ दो टूक लिखता हूँ
मैं जब भी तेरे ग़मों में, डूब के लिखता हूँ
लोग कहते है ....वाह क्या खूब लिखता हूँ ||

मेरी कविता की किताब के एक एक पन्ने
तुझे तेरी जिन्दगी का हिसाब देंगे ...
मेरे छंद देंगे, तुझे होंसला जीने का
शब्द तेरी आँखों पे, हसीं ख्वाब देंगे .. ||

तुम देती हो मेरे शब्दों को जीवन
मैं तेरे नाम अपना, "वजूद" लिखता हूँ
मैं जब भी तेरे ग़मों में, डूब के लिखता हूँ
लोग कहते है ....वाह क्या खूब लिखता हूँ ||

Saturday, September 17, 2011

नये रंग ...


मैंने आज दीवारों को रंगा है
इस उम्मीद से, की ये नये रंग
कुछ मेरी जिन्दगी, भी बदल देंगे ...
कुछ खुशियाँ जीवन में भर देंगे ..
इसीलिए...मैंने ....
थोडा नीला रंग चुना है ...
ताकि अपने अरमानों को, पंख लगा के उड़ लूँ
और जब चाहूँ, आसमाँ छू लूँ ...||

थोडा मैंने हरा भी चुना है
ताकि हरियाली , खुशियाली रहें
हमारे घर - आँगन में ...॥

कुछ लाल रंगा है
ताकि ढलते सूरज की, लालिमा को महसूस कर सकूँ...
थोडा सा हिस्सा गुलाबी रखा है
ताकि कुछ गुलाबी यादें, तेरे - मेरे जीवन का हिस्सा बन सकें ||
एक दिवार सफ़ेद छोड़ दी है ...
इस उम्मीद में की ,
उसे अच्छी यादों से सजाउंगी...||

मुझे पता है , तुम अब भी नाराज हो...
क्यूंकि मैंने, तुम्हरा पसंददीदा रंग, "काला" नहीं लगाया ...
पर ये काला रंग, कालेपानी की सजा सा लगता है
मै ऊब चुकी हूँ उससे,
दम घुटता है मेरा , जब अकेली होती हूँ...
काला रंग, अँधेरा ला देता है जीवन में ...
और मुझे अब सिर्फ उजाले की तलाश है...

सुनो ना ....
इस बार तुम भी इन नये रंगों से खेलो
अँधेरे को छोड़ कर उजाले से मिलो ... !!

Wednesday, September 7, 2011

आज मेरा गम, तेरे गम सा क्यूँ है


आज मेरा गम, तेरे गम सा क्यूँ है ?
हम सब सुरक्षित है, यह वहम सा क्यूँ है ?
जख्म बन चुका है नासूर
पर वो ही पुराना मरहम सा क्यूँ है ?

बेकसूरों को मुआवजा , जान कि कीमत ?
और खुनी को बिरयानी , दामाद सी आवभगत
इस देश में ऐसा, नियम सा क्यूँ है ?
आज मेरा गम, तेरे गम सा क्यूँ है ?

गांधी भी चुप हैं , और भगतसिंह भी मौन है
सब जानते है पता कातिल का ....
पर सब "बन" के पूछ रहें है, कि अपराधी कौन है ?
आँख बंद करने से मौत टल जायेगी, तुझे ऐसा भ्रम सा क्यूँ है ?
आज मेरा गम, तेरे गम सा क्यूँ है ?

इन सफेदपोशों को, आईना भी, चेहरा कैसे दिखा देता है ?
बेशर्मी इतनी लहू में इनकें , लाशों पे राजनीति करना सीखा देता है ||
मारें तुने बेगुनाह हजारों , कभी कोर्ट में कभी फोर्ट में , कभी रोड पे कभी मोड़ पे
पर यह तो बता , इन सफेदपोश गद्दारों पे तेरा रहम सा क्यूँ है ?
आज मेरा गम, तेरे गम सा क्यूँ है ?
हम सब सुरक्षित है, यह वहम सा क्यूँ है ?

Tuesday, August 23, 2011

करवटों के सहारे...



करवटों के सहारे.. हर रात बीती है
तन्हाई में मेरी, सुबह जीती है ...
वो चैन से सोता है , मुंह उधर कर
रोजाना मेरी आँखे , मेरे अश्क पिती है ||
करवटों के सहारे.. हर रात बीती है ...

ये किस मोड़ पर मेरा जीवन ,
कि मेरा अपना कुछ ना रहा ...|
ना आँखों में सपने रहे , ना सपनों का राजा,
अब मैं भी ना रहूँ ....?
क्या यही है वक्त का तकाजा ?

हर रोज उधेड़ जाता है, वों जख्म मेरे ...
जिन्हें कितनी मुश्किल से, काली रातें सीती है
करवटों के सहारे.. हर रात बीती है ||

चारों और इतना अँधेरा क्यूँ है ?
मेरा गम इतना गहरा क्यूँ है ?
जिसमें बसती थी, रूह मेरी
वों बिन मेरे भी , पूरा क्यूँ है ?

ना जानें भाग्य कि कैसी "नीयती है
सब कुछ पा कर भी , जिन्दगी रिती है
करवटों के सहारे.. हर रात बीती है ||

Wednesday, August 10, 2011

बंद झरोखे से "सपनें"


कुछ "सपनें" भी बंद झरोखे से है ....
जिनकें कपाटों को गर खोल दिया तो
तूफ़ान सा आ जाएगा ||
"ताश के पत्तों सा जीवन"
बिखर जाएगा ...
पर आंधी के डर से
कब तक बंद रखा जा सकता है
दरवाजों को ?
"धुप" का इंतज़ार भी तो है
"सीली" हुई सी "दीवारों" को ...
और अँधेरे के खात्मे के लिए
कुछ "रौशनी" भी तो चाहियें ||
और कुछ "ताज़ी हवा" कि भी
दरकार है जीने के लिए ...||

Saturday, August 6, 2011

दोस्त हैप्पी फ्रेंडशिप डे

कभी हँसाता है, कभी रुलाता है ,
ये, वो रिश्ता है, जो जीना सिखाता है ||
कच्चे धागे में, अनमोल मोती सा ...
चाहे मीलों दूर ही सही, पर आँखों कि ज्योति सा ...
कभी सच्चा सा , कभी झूठा सा ...
कभी हमें मनाता, मिन्नतें कर के, कभी हमसे ही रूठा सा ...

मेरे अधूरे सपने वो अपनी पलकों पे सजाता है ...
अक्सर मेरी परछाई में, वो अपना अक्स दिखाता है,
ये वो रिश्ता है, जो जीना सिखाता है ||

कभी आभास सा , कभी अहसास सा
टेड़ा मेडा जलेबी कि तरह, पर शहद कि मिठास सा
उडती पतंग कि डोर सा , सुरीले संगीत के शौर सा ..

मेरे रुके कदम को वो अपने होसलों से चलाता है
मंदिर मस्जिद गुरुद्वारें जिसकी तलाश में हम घूमें ..
वो खुद, दोस्त बन के हमारी जिन्दगी में आता है
ये रिश्ता जीना सिखाता है

Wednesday, July 20, 2011

बारिश के बाद कि सुबह..


बारिश के बाद कि सुबह ,थोड़ी भीगी सी , थोड़ी अलसाई सी
हरें पेड़ों कि पत्तियां थोड़ी खिली सी, थोड़ी मुरझाई सी ...
थोड़ी नमी सी दीवारों में , थोड़ी बूँदें किनारों में
थोड़ी सी मस्ती इशारों में, उड़ते परिंदे नजारों में
सूरज कि बाहें खुली खुली , हर एक कली इठलाई सी
बारिश के बाद कि सुबह ,थोड़ी भीगी सी , थोड़ी अलसाई सी ||

जारी है , बादलों का सूरज के साथ,अठखेलियाँ करना
गीले आँगन में हमारा , संभल संभल के चलना ...
टूटी छतों कि मरम्मत का दौर , कहीं से बहते पानी का शोर ||
अभी तक वो छोटी गिलहरी , पानी से कुछ सकुचाई सी
बारिश के बाद कि सुबह ,थोड़ी भीगी सी , थोड़ी अलसाई सी ||

बारिश के बाद कि सुबह , ना जाने क्यूँ आसमान , कुछ ज्यादा ही नीला सा है
पत्तों, पेड़ों , दीवारों , धरती के साथ, मन भी तो थोडा गीला सा है ||
सीली- सीली हवा के झोंके, ख्वाबों में भी कुछ सीलन सी ले आयें है..
गीली हरी दूब के अहसास को , हम अपना दिल दे आयें है...
देखो फिर एक बार , प्रक्रति ने हमसे, दोस्ती निभाई सी ...
बारिश के बाद कि सुबह ,थोड़ी भीगी सी , थोड़ी अलसाई सी ||

Thursday, July 14, 2011

आ उड़ चले अब गगन में...


आ उड़ चले अब गगन में , धरती पे बहुत शौर है
हर एक शाम रंगी खून से , सिसकती हर एक भौर हैं
आ उड़ चले अब गगन में , धरती पे बहुत शौर है ||

जो सफेदी कभी देती थी शांति का सन्देश
उस को लपेटे खड़ा , कोई कातिल है कोई चोर है
आ उड़ चले अब गगन में , धरती पे बहुत शौर है ||

अँधेरा कर गयी पूरी जिन्दगी में, एक सुहानी शाम
गायब हुई मुस्कराहट लबों से , ना मिलें आसुओं को आराम
उतरा नहीं इक निवाला हलक से , हाथों में अधूरी रोटी कि कोर है
आ उड़ चले अब गगन में , धरती पे बहुत शौर है ||

इंसान ही इंसानियत का कर रहें है खून ...
हरी भरी धरती को लाल करने का कैसा है ये जूनून ?
सहमा - सहमा हर एक शख्स, किस काम का ये नया दौर है ?
आ उड़ चले अब गगन में , धरती पे बहुत शौर है ||
------------*--------*-----------*----------------*
कुछ दिन करेंगे हो हल्ला , फिर सब चुप हो जायेंगें
सचिन का होगा सौवां शतक , हम धमाकों का दर्द भूल जायेंगें
दिल्ली कहेगा मुंबई कि गलती , मुंबई कहेगा दिल्ली कि
इस देश में ऐसा होता रहेगा , ये लड़ाई है चूहे बिल्ली कि
ना जाने लाल किले के कानों को कोन सा धमाका हिलाएगा
कब तक इस प्यासी धरती को , आम आदमी का लहू दिया जाएगा ?
मुंबई आतंकवादी हमलें में मारे गए सभी आम आदमी को इस आम आदमी कि और से अश्रुपूर्ण श्रदांजलि ||

Thursday, July 7, 2011

हसीं ख्वाब /बेरंग जिन्दगी



मुझे चाँद में तू नजर नहीं आती आज कल
जब से उस गरीब को उसमें रोटी दिखाई दि है ||

मुझे फुहारों में तू नजर नहीं आती आज कल
जब से उस गरीब कि झोपडी, टूटी दिखाई दि है ||

तेरे इंतज़ार में लम्बी नहीं लगती रातें अब ...
जब से उसकी रातें , रोती दिखाई दि है ||

तेरे ख्वाब मेरी नींदे चुराते नहीं अब ..
जब से जिन्दगी फूटपाथ पे सोती दिखाई दि है ||

तेरा यौवन लुभाता नहीं मुझे अब
जब से उसकी फटी कुर्ती, छोटी दिखाई दि है ||

हसीं ख्वाब बेमानी लगने लगे है ...
जब से वो जिन्दगी खोती दिखाई दि है

मै ख्यालों में जी रहा था अब तक
जिन्दगी अब महसूस होती दिखाई दि है ||

मुझे चाँद में तू नजर नहीं आती आज कल
जब से उस गरीब को उसमें रोटी दिखाई दि है ||

Tuesday, June 28, 2011

बोझिल रिश्ते ...


जब रिश्तों से घुट के कोई अपनी जान देता है
तो लगता है क्यों ऊपर वाला ये रिश्ते तमाम देता है ?
वो तो बैठा है धुनी रमा के बेफिक्र
यहाँ तो भाई - भाई पे इल्जाम देता है
क्यों ऊपर वाला ये रिश्ते तमाम देता है ?

सात जन्मों तक रिश्ता निभाने वाले
ऊब जाते है दो चार सालों में ...
मुकद्दर से मिला है जो रिश्ता , वो भी आ जाता है सवालों में ?
इतनें जख्म दें देतें है कुछ लोग , कि मरहम भी कहाँ आराम देता है
क्यों ऊपर वाला ये रिश्ते तमाम देता है ?

अब तो खून के रिश्ते इंसानियत का भी खून कर रहे है
नौ महीने रखा कोख में जिसको ,आज माँ बाप उसी से डर रहे है
हर फरियादी को कहाँ वो मुक्कमल इनाम देता है
क्यों ऊपर वाला ये रिश्ते तमाम देता है ?

मैं इस कद्र खौफजदां हूँ इन रिश्तों से , कि सब से किनारा कर लिया है
जो देता है सुकून दिल को, उसी को जीने का सहारा कर लिया है
अक्सर धोखा मिला है अपनों से हमें , अब शायर दोस्ती को ही सलाम देता है|
क्यों ऊपर वाला ये रिश्ते तमाम देता है ?

Wednesday, June 22, 2011

मैं आम आदमी हूँ ...


मैं आम आदमी हूँ ...
मै खरीद के आम ला नहीं सकता , शक्कर इतनी महंगी कि ख़ुशी में भी मीठा मँगा नहीं सकता ||
मै भूखा रह नहीं सकता , और इस महंगाई में पेट भर खा नहीं सकता
अब तो बिना चेकिंग कराये में भगवान के दर भी जा नहीं सकता,
आरक्षण का डंक ऐसा कि , कितना भी पढ़ लूँ मैं अव्वल आ नहीं सकता ||
घुटनों में रहता है दर्द हमेशा , पर मैं महंगे पेट्रोल का खर्चा भी उठा नहीं सकता
सपने रोज बुनता हूँ आशियाना बनाने के , लेकिन बढती ब्याज दरें ,अब EMI चूका नहीं सकता ||

मैं आम आदमी हूँ ...
किसी को भी सरताज बना सकता हूँ ?,मैं आम को खास बना सकता हूँ ,
लेकिन फिर उस खास तक अपनी आवाज़ पंहुचा नहीं सकता ...
मुझे क़दमों तले रख के ही सभी आगे बढ़ जाते है...
कभी मुझे being human तो कभी india against corruption दिखाते है
मै नहीं जानता लोकपाल , न ही काला धन देखा है कभी ,
फिर भी उनके सुर में ताल मिलाता हूँ , क्यूंकि "बड़ा" कभी गलत बात सीखा नहीं सकता ||

मैं आम आदमी हूँ ....
में भीड़ में खो रहा हूँ , आजाद होने का सारा क़र्ज़ टूटे कंधों पे ढो रहा हूँ
रोज पानी पीने के लिए कुआँ मै खोद नहीं सकता ...
मुस्कराते है मुझे देख के लोग , खुल के इसलिए रो नहीं सकता ...||

मैं आम आदमी हूँ ....
मुझ से मिलना जो चाहो तुम तो चले आना मै मिलूँगा तुम्हे ....

कभी फूटपाथ पे किसी बड़ी गाडी के निचे , तो कभी भीड़ में सफ़ेद कपडे के पीछे
कभी रामलीला में मार खाते हुए तो कभी सरकारी दफ्तरों में चक्कर लगाते हुए
कभी मिलूँगा प्रशासन से डरता हुआ , तो कभी भूख से बिलख बिलख के मरता हुआ
कभी किसी साधू के पीछे तो कभी किसी नेता के पीछे
अक्सर मिल जाऊंगा तुम्हे किसी बड़ी ईमारत कि नींव के निचे ||
कभी अनशन में तो कभी भाषण में , कभी भिखारी कि तरह खड़ा राशन में ||
कभी किसी कवि कि लेखनी में "दरिद्र" , तो कभी बना "राजा" कहानी किस्सों में
कभी मिलूँगा पेड़ पे लटका सीधा , तो कभी बम से बँटा हिस्सों हिस्सों में
कभी मिल जाऊँगा खाली जेब टटोलते हुए , कभी खाली डब्बों को बार बार खोलते हुए ||
मिल जाऊँगा बसों ट्रेनों कि छत के ऊपर , किसी बेरंग पुराने ख़त के उपर
कभी देश के "दुश्मनों" कि "गोली" खाते हुए , कभी देश के "सिपहसलारों" कि "गाली" खाते हुए|
आज कल जरा फ़ालतू हूँ मिल जाऊँगा हर नुक्कड़ पे काले धन, भ्रष्टचार पे बतियाते हुए ||
मैं आम आदमी हूँ , मुझे चाह के भी कोई मंजिल दिला नहीं सकता ,
मेरा जन्म हुआ है दुःख भोगने के लिये , कोई मुझे मेरे सपनों से मिला नहीं सकता ||

Wednesday, June 15, 2011

दो पल का साथ ...


वो जान के मुझको , मुझ से यूँ अनजान हो गया ..
खुदा देखा था जिस शख्स में मैंने, वो भी इंसान हो गया |
गुलिस्ताँ था गुलशन तेरे आने से पहले....
इक तेरे आकर के चले जाने से, वीरान हो गया ||
खुदा देखा था जिस शख्स में मैंने, वो भी इंसान हो गया |

यहाँ मौत भी कहा अपनी मर्ज़ी से मिलती है |
फिर हमें भी ऊपर वाले ने ही मिलाया होगा ?
चार दिन कि चांदनी , दो पल का साथ ,
ये सभी रंग देख के, मै भी हैरान हो गया
खुदा देखा था जिस शख्स में मैंने, वो भी इंसान हो गया ||

यूँ तो अपना हर ख्वाब टूट ही जाता है सुबह से पहले
मंजिल तक भी कोई साथ चलता नहीं .....
हर मोड़ पे मिलते है मुसाफिर , अपना लाखों में एक मिलता नहीं
शायर तेरे जाने से , इक पल को परेशान हो गया ...
खुदा देखा था जिस शख्स में मैंने, वो भी इंसान हो गया ||

इन शब्दों कि आहट , तुझ तलक भी पहुचें ...
क्यों हुआ , क्या हुआ तू भी बैठ के सोचे...
तुझे तो अहसास भी न हुआ , तेरे गुनाह का
पर तू जहाँ -२ से गुजरा, बेवफाई का फरमान हो गया
खुदा देखा था जिस शख्स में मैंने, वो भी इंसान हो गया ||

Wednesday, June 8, 2011

पराया हुआ देश ...



हम अपने देश में ही पराये हो गए है , ये कौन सी हवा बहने लगी है..?
चंद विदेशी हाथ बटोरने में लगे है , हमारी खून पसीने कि गाढ़ी कमाई ,
साधू को बना दिया अपराधी इन्होने , और आतंकवादी बने है इनके जमाई ||
भ्रष्टाचार से लड़ने वालो को भी सरकार, साम्प्रदायिक ताकतें कहने लगी है
हम अपने देश में ही पराये हो गए है , ये कौन सी हवा बहने लगी है ||

जिन को हमने चुना देश चलाने को, वो हमें ही चुन चुन के मार रहे है ?
हरिश्चंद्र के देश में सच कि आवाज़ उठाने वाले, झूट के आगे हार रहे है ||
वाल्मीकि किस हक़ से लिखे अब रामायण, रामलीला में भी रावण सेना रहने लगी है||
हम अपने देश में ही पराये हो गए है , ये कौन सी हवा बहने लगी है

गांधी के देश में सत्याग्रह हो गया पाप ,अपने हक़ के लिए लड़ना भी बन गया अभिशाप ||
गांधी के आदर्शो को गांधी ने कर दिया साफ़ , गांधी जिसकी जेब में वो ही अब माई बाप ||
आम आदमी कि मजाल क्या सर उठा के जिये,
गांधी कि आत्मा भी अब यहाँ सहमी सहमी रहने लगी है |
हम अपने देश में ही पराये हो गए है , ये कौन सी हवा बहने लगी है..?

Sunday, June 5, 2011

मैं केवल एक इंसान ही तो हूँ ॥?


मैं केवल एक इंसान ही तो हूँ ॥?

क्या हुआ गर मुझे नहीं मिला, मेरी करनी का फल ...

क्या हुआ गर हुआ मैं , हर राह पे विफल ......

मै टूटते सपनों का , चलता फिरता शमशान ही तो हूँ

मैं केवल एक इंसान ही तो हूँ ॥?


क्या हुआ गर मेरे कदम सत्य कि तलाश में लडखडा जाते है

क्या हुआ गर कागज़ के चंद टुकड़े मुझे ललचाते है ?

मैं सिगरेट के पेकेट पे बना कैंसर का निशान ही तो हूँ

मैं केवल एक इंसान ही तो हूँ ॥?


क्या हुआ गर मै रिश्तों को एक धागे में पिरो नहीं पाया

क्या हुआ गर मैं कभी अपनों के काम नहीं आया ...

मै फिर भी मुश्किल सवालों का हल, आसान ही तो हूँ |

मैं केवल एक इंसान ही तो हूँ ॥?


क्या हुआ गर मुझे दर्द किसी का दिखाई नहीं देता

क्या हुआ गर मुझे सिसकियाँ किसी कि सुनाई नहीं देती

मै मंदिर में बैठा , पत्थर का भगवन ही तो हूँ ...

मैं केवल एक इंसान ही तो हूँ ॥?


क्या हुआ गर आशाएं मैंने किसी कि पूरी नहीं कि

क्या हुआ गर मैंने नाम किसी का नहीं किया रोशन

मैं फिर भी तुम्हारे लिए एक इनाम ही तो हूँ

मैं केवल एक इंसान ही तो हूँ ..||

मैं केवल एक इंसान ही तो हूँ ..||

Wednesday, June 1, 2011

कुछ सच ...


हमें हर मुस्कान के बदले अपना एक ख्वाब देना पड़ता है
न जाने क्यूँ हमें अपने किए का हिसाब देना पड़ता है
वो तो लूट के ले गया सब कुछ उजाले में
हमे तो अँधेरे का भी जवाब देना पड़ता है ||

जो चलना सीखे थे हमारी ऊँगली पकड़ के कभी,
उन्हें अब हमारा, धीरे चलना अखरता है .....
वो चल पड़ा है खरीदने खुशियाँ कागज़ के चंद टुकड़ों से ,
सच भी तो ये है ,सही भाव पे यहाँ हर रिश्ता बिकता है ||

जो चिराग किए थे हमने रोशन कभी , अँधेरा मिटाने को ...
उसकी लौं आज काम आ रही घर जलाने को ||
किसे फ़िक्र पड़ी है अब किसी के अरमानों कि ?
मेरा दर्द तेरी आँखों से , बात हो गयी है वो गुजरे जमाने कि ||

अब तो दिल टूटता है तभी दिल लिखता है
हर रिश्ता पूरा, केवल टूटे आईने में दीखता है

Friday, May 6, 2011

"माँ" HAPPY MOTHER'S DAY


"माँ" एक रिश्ता नहीं एक अहसास है
भगवान
मान लो या खुदा , खुद वो माँ के रूप में हमारे आस पास है
इस एक शब्द में पूरे जीवन का सार समाया है
जब भी रहा है दिल बैचेन मेरा , सुकून इसके आँचल तले ही पाया है ||
पलकें भीग जाती है पल में ......."माँ" को जब भी याद किया है तन्हाई में ,
जब भी पाया है खुद को मुश्किलों से घिरा, साथ दिखी है वो मुझे मेरी परछाई में ||

न जाने कौन सी मिट्टी से "माँ" को बनाया है ऊपर वाले ने ....
कि वो कभी थकती नहीं , कभी रूकती नहीं ,
उसे अपने बच्चों से कभी शिकायत नहीं होती ...
आसुओं का सैलाब है भीतर ,पर आँखों से वो कभी नहीं रोती ||
उसे टुकड़ा -टुकड़ा हो के भी , फिर से जुड़ना आता है ,
अपने लिये कुछ किसी से, नहीं उससे माँगा जाता है ||
कितना भी लिखो इसके लिये कम है , सच है ये कि "माँ" तू है, तो हम है ||

बड़े खुशनसीब है वो जिन के सर पर माँ का साया है
और बड़े बदनसीब है वो जिन्होंने अपनी माँ को ठुकराया है
मुझे दौलत नहीं चाहियें , शोहरत नहीं चहिये , न चाहियें मुझे वरदान कोई
मुझे चाहियें "माँ" के चेहरे पे सुकून के दो पल और उसके होटों पे मुस्कान ||
करना चाहूँगा में कुछ ऐसा कि मेरे नाम से मिले मेरी माँ को पहचान ||

Friday, April 22, 2011

गुजरात दंगो का दर्द ...


मुझे पता है क्या हुआ था उस रात को ,
लेकिन मैं भूल जाना चाहता हूँ हर उस बात को ,
क्यूंकि उस हर बात से मेरे जख्म हरे होते है
उस खुनी शाम को याद कर मेरे सपने आज भी डरें होते है ||

क्या होगा कब्रों को फिर से जिन्दा कर के ?
हजारों बेगुनाहों कि लाशों को बार बार शर्मिंदा कर के ?
राजनीती ने लाशें बिछाई है ,अब मुझे लाशों पे राजनीती नहीं चाहिए
मुझे हर सफ़ेद कपड़ा कफ़न नज़र आता है ,अब मुझे किसी कि सहानुभूति नहीं चाहियें ||
वो एक तूफ़ान था जो उड़ा ले गया सब कुछ ...
अब चिंगारी को फिर से हवा दे के फिर से आग न लगाइए
मकान पक्के बन चुके है, फिर से उनकी नीवें हिलाने मत जाइए ||

तू सही था या था तू गलत मुझे उस से अब सरोकार नहीं
क्यूंकि मैं जानता हूँ ऊपर वाले कि लाठी को आवाज़ कि दरकार नहीं ||
मैं तरक्की पसंद मुल्क चाहता हूँ , मैं जीना चाहता हूँ अमन चैन से...
तू अपने आप को कितना भी बड़ा समझ ले ,
पर ध्यान रख कोई बच नहीं सकता उसके तीसरे नैन से ||

Monday, April 18, 2011

मुर्दों कि बस्ती में घर


मैंने मुर्दों कि बस्ती में, अपना घर बना लिया है ,
अपने हक कि आवाज़ को भी कब्र में दफना दिया है॥
चारों और जिन्दा लाशों से घिरा बैठा हूँ मैं
अपने ईमान को भी दीवारों में चुनवा दिया है
मैंने मुर्दों कि बस्ती में अपना घर बना लिया है॥

मेरी अंतरात्मा कि आवाज़ भी अब मेरे कानों तक नहीं आती
आँखे क्या खोलूं मैं, पीर मुझ से किसी कि देखी नहीं जाती ||
ये "लोकतंत्र" कुछ ही लोगो को आ रहा है रास
बाकी भारतीय तो भोग रहे है आजीवन वनवास ||
किस -किस को दोष दूँ मैं .. ..सब ने आज़ादी का तमगा लगा लिया है |
मैंने मुर्दों कि बस्ती में अपना घर बना लिया है॥
अपने हक कि आवाज़ को भी कब्र में दफना दिया है॥

न पक्ष को मेरी पड़ी है और न ही विपक्ष को मेरी पड़ी है
हर एक सफ़ेद पोश कि आँखों पे काली पट्टी चढ़ी है ॥
सफ़ेद कपडे वालों के दिल है कितने काले
दिख रहे है दूर तक घोटाले ही घोटाले
और जो थामने चला मैं लाल किले के तिरंगे को
जख्म से नासूर हो गये मेरे पैर के छाले
मैं सह रहा हूँ जीने का दर्द, इस दर्द को ही अब मैंने जीवन बना लिया है |
मैंने मुर्दों कि बस्ती में अपना घर बना लिया है ,
अपने हक कि आवाज़ को भी कब्र में दफना दिया है॥

Tuesday, April 5, 2011

मेरा इंतजार...


ऐ डाकिये मुझे उस घर का पता बता दे , जिस घर के कागज कलम को आज भी मेरा इंतजार है
जा ,ये ख़त उस तलक पहुचां दे , जिस को अब तक मेरे आने का ऐतबार है ||
अब पतझड़ के पत्तो को हवा दे , रुकी इंतज़ार कि घड़ियों को अब तो चला दे |
जा उसको मेरा पैगाम दे , जो झरोखे से झांकती... तेरे अक्स में , कर रही मेरा दीदार है ||
जा ,ये ख़त उस तलक पहुचां दे , जिस को अब तक मेरे आने का ऐतबार है ||

तू जो गुजरेगा उसकी गली से, तो उसकी पायल मे भी खनक होगी
उसकी और बढ़ते तेरे कदम देख , उसकी आँखों में अजब सी चमक होगी ||
जा अब उसका पता लगा ले , जिस पे ज़माने कि हर खुशियाँ निसार है
जा ,ये ख़त उस तलक पहुचां दे , जिस को अब तक मेरे आने का ऐतबार है ||

कुछ अधूरे ख्वाब है , कुछ अधूरे हम , कुछ अधूरी खुशियाँ उसके बिना , कुछ पूरे गम ||
अब आईने को हँसना सिखा दे.., एक झलक उसकी दिखा दे , क्यों इंतज़ार ही हर बार है ?
जा ,ये ख़त उस तलक पहुचां दे , जिस को अब तक मेरे आने का ऐतबार है ||

उसने भी कभी कागज़ पे ... मेरी तस्वीर उकेरी होगी ....आड़ी- टेडी लकीरों से...
उसको भी कभी दुआ में, मिलें होंगे मेरे ख्वाब , आते - जाते फकीरों से ||
जा उसको अब बता दे , वो मेरा अनकहा सा, अनछुआ सा , अजीज प्यार है
जा ,ये ख़त उस तलक पहुचां दे , जिस को अब तक मेरे आने का ऐतबार है ||

Monday, March 21, 2011

इस आग को हवा दीजिये ...


ये कविता कहानी है मलाड कि निधि गुप्ता कि जिन्होंने कुछ दिन पहले हार के अपने आप को इस ज़माने के गम से जुदा कर लिया ,लेकिन उसका यूँ जाना इस दिल को बहुत अखरा है... यूँ ही हार के अपने आप को खत्म कर लेना किसी भी परेशानी का हल नहीं है , आप को जीना सीखना होगा , आप को दर्द को अपनी ताकत बनानी होगी ...अब इस चिंगारी को हर एक को अपने अन्दर जलानी होगी ||

क्यों वो रिश्तो का बोझ उठाये जा रही है ,?
क्यों वो सूखे फूल सी मुरझा रही है ...??
भगवान में आस्था रखने वाली वो ...
अपने बनाये इंसान से ,अब तक क्यों धोखा खा रही है ??
क्यों वो रिश्तो का बोझ उठाये जा रही है ...?

न जानें क्यों वों सहमी सहमी रहती है ? न जानें क्यों वों सब कुछ सहती है ?
क्यों हर कोई उसका साथ छोड़ देता है ? क्यों हर कोई उससे मुहं मोड़ लेता है ??
क्यों स्त्री आज भी अग्नि परीक्षा कि रस्म निभाए जा रही है ?
क्यों वो रिश्तो का बोझ उठाये जा रही है ,??

सीता कि अग्नि परीक्षा एक प्रथा बन चुकी है, आज हर स्त्री कि यही व्यथा बन चुकी है
चुप रह के अन्याय को सह लो ,और सर उठा के चलना है तो घुट घुट के रह लो ||
और गर घुटन हद से गुजर जाए तो कर लो फ़ना जिन्दगी के सफ़र को
पर क्यों वों ऐसा कर , लाखो के जीने कि लौं को बुझा रही है ?
क्यों वो रिश्तो का बोझ उठाये जा रही है ??

अब समय इस आग में जलने का नहीं है ,इस आग को अपने अन्दर जलाने का है
समय कमजोर बन के सब कुछ सहने का नहीं है ,अन्याय का पुरजोर विरोध करने का है
अबला को अब बला बनना होगा , सीता को दुर्गा का रूप धरना होगा
हर एक स्त्री को खुद के लिये कदम से कदम मिला के चलना होगा ||

'निधि' कि चिता कि चिंगारी को हवा दीजिये , इस चिंगारी को शोला बना लीजिये
दो टूक जवाब दीजिये अन्याय को दुनिए के , क्युकी ये दुनिए आप को भरमा रही है ||
"विजय" साथ होगी हर कदम पे , गर आप अपना कदम खुद उठा रही है ||
खुद में हिम्मत है तेरे, तुझ से जमाना है फिर क्यों तू ज़माने से घबरा रही है
क्यों तू सूखे फूल सी मुरझा रही है ...??

Thursday, March 17, 2011

रंगों भरी होली



आप सभी पाठकों को और हमारी कलम से जुड़े हर एक इंसान को दिल कि कलम परिवार कि और से शुभ होली|
ये होली आप के जीवन में खुशियों के रंग बिखेर दे ||

दिल कि कलम परिवार में एक और नया मेहमान हाजिर है अपनी कलम कि लिखी को आप के दिल तक पहुचाने के लिये ... आशा है आप का साथ और आशीर्वाद हमे कमेन्ट के रूप में मिलता रहेगा ,

शुभ होली ||

धन्यवाद

दिल कि कलम से...

सुन
री सखी आई है होली, मैं भी खेलूंगी तेरे संग होली
उमंग
है तरंग है मन में ,बीती होली की यादें है मन में
सुन
री सखी आई है होली...

वो
करते रहना सारे दिन ठिठोली, याद आती है वो बचपन की होली
वो गुन्झियाँ , वो रंगबिरंगे गुलाल , कहीं लाल पीले तो कहीं काले होते गोरे गाल ||

उड़ते रंग आसमन में , दिखते एक से चेहरे हर इंसान में ...

वो शरारती तेवर , वो प्यार भरी बोली .. चारो और भागती पानी लिये बच्चों कि टोली ..

सुन री सखी आई है होली....

होली के रंग आज भी बदले नहीं उतने, रिश्ते और संस्कार बदले है जितने ..
आज कहीं पे जल रही है रिश्तों की होली, तो कहीं पे चल रही है बन्दुक से गोली
दिल
में उमंग तो है पर मन सहमा सहमा है, खुशियाँ मन में है और हमें कुछ कहना है..
इच्छा दिल की हो इस बार ऐसी होली, खुशियों के हो रंग , संग में हो चावल रोली
डोर
हो ऐसी रिश्तों की जैसे दामन चोली,खेलूंगी री सखी तब मैं भी होली
सुन री सखी आई है होली...

Saturday, March 12, 2011

ये मुंबई है मेरे यार ..





थोड़ी सी जानी सी है थोड़ी पहचानी सी ....ये मुंबई फिर भी अनजानी सी है
यहाँ हर कोई अपना सा है ...ऊँची ऊँची इमारते इक सपना सा है ...
नयी इमारते मन को देती सुकून सी है
और पुरानी खड़ी ....अपने आप में जूनून सी है ॥
लोकल से तेज चलते आदमी है ...फिर भी मंजिल क़दमों से दूर है
दिन भर कि भाग दोड़ में हर एक थक के चूर है ,
फिर भी मुंबईकर होने का अजब सा गुरुर है ||
न जाने इतने लोग मुंबई में आये कहाँ से है ?
भगवान ने इतने अलग-अलग चेहरे बनाये कहाँ से है ??
यहाँ हर एक करता अपनी मनमानी सी है
ये मुंबई फिर भी अनजानी सी है ||
हर एक भाग रहा है इस शहर में अपनी पहचान बनाने को
हर एक छोड़ देना चाहता है अपने पीछे ज़माने को |
मुंबई हमेशा खुली है हर एक का घर बसाने को ||
ये मुंबई दिलवालों के लिये दीवानी सी है ...
ये मुंबई फिर भी अनजानी सी है ||
यहाँ छोटी छोटी "चालों" में ... जिन्दगी बसर करती है...
बड़ी - बड़ी इमारतों में बननें वाली चालें ,पूरे देश पे असर करती है ...
यहाँ हर एक कि शक्ल हीरो सी है , सभी के सपनों कि कीमत जीरो सी है ...
किसी के लिये मुंबई मज़बूरी है , किसी के लिये मुंबई जरुरी है ...
कसमों-वादों कि जिन्दगी.... निभानी सी है
ये मुंबई फिर भी अनजानी सी है ..||
मुंबई कभी सोती नहीं है , कितना भी दर्द मिले कभी रोती नहीं है ...
मुंबई ने थकना नहीं सिखा , किसी भी मोड़ पे रुकना नहीं सिखा ..
इसकी फितरत बुढ़ापे में जवानी सी है, ये मुंबई फिर भी अनजानी सी है ||
सलाम मुंबई ||
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