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Thursday, November 17, 2011

जरा समय निकाल कर आ ...


तेरे मेरे दरमयां कुछ बातें , अधूरी पड़ी है
जरा समय निकाल कर आ
थोड़े मेरे "लफ्ज" ले जा ,थोड़े अपने "गम" दे जा ||

बामुश्किल खुशियाँ जोड़ी है, तेरे इंतजार में
जरा समय निकाल कर आ
मुझे आंसू दे जा , अपनी खुशियाँ ले जा ||

कुछ त्यौहार अधूरे पड़े है , तेरे इंतजार में
जरा समय निकाल कर आ
अपने पीने की वजह ले जा , मुझे जीने की वजह दे जा ||

उन गलियों में , हमारे कुछ पुराने किस्से रखें है
कुछ इल्जाम तो ले लिए मैंने अपने सर
बाकी कुछ तेरे हिस्से रखें है |
जरा समय निकाल कर आ
अपना इनाम ले जा, मुझे और इल्जाम दे जा ||

पिछली बात का जख्म , अब भी हरा है
आँखों में, आसुंओं का ,समन्दर भरा है
उन जख्मों को कुरेदने के बहाने आ
अपन हक ले जा , मुझे और जख्म दे जा |

तेरे मेरे दरमयां कुछ बातें , अधूरी पड़ी है
जरा समय निकाल कर आ

5 comments:

vidya said...

बहुत ही सुन्दर रचना....बधाई स्वीकार करें विजय जी.

नीरज गोस्वामी said...

उन गलियों में , हमारे कुछ पुराने किस्से रखें है
कुछ इल्जाम तो ले लिए मैंने अपने सर
बाकी कुछ तेरे हिस्से रखें है |

वाह...वाह...बहुत कमाल की रचना...बधाई स्वीकारें

नीरज

Sunil Kumar said...

पिछली बात का जख्म , अब भी हरा है
आँखों में, आसुंओं का ,समन्दर भरा है
उन जख्मों को कुरेदने के बहाने आ
अपन हक ले जा , मुझे और जख्म दे जा |
दिल हो दुखाने के लिए आ हमें तो यह याद आया गया , अच्छे शेर दाद कुबूल करें .....

sushma 'आहुति' said...

तेरे मेरे दरमयां कुछ बातें , अधूरी पड़ी है
जरा समय निकाल कर आ
थोड़े मेरे "लफ्ज" ले जा ,थोड़े अपने "गम" दे जा ||bhaut hi khubsurat......

Rahul said...

amazing writing

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