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Tuesday, September 16, 2014

यूँही तेरे ख्यालों में :-


तेरी चाहतें छोटी सी है 
पर तेरे बंधन बहुत बड़े 
तू जिनके बारे में सोचे 
वो देखेंगे तमाशा दूर खड़े 

चल खोल मन का पिंजरा 
थाम हाथ साथ में उड़ चलें 
ये मौका अभी मिला है हमें 
फिर शायद राह मिले न मिले

तेरे लब पर ख़ुशी के लिए
हर दाग को सह लूंगा मैं
तूने सोच भी कैसे लिया
तेरे बैगेर रह लूंगा मैं

तुझ से मिलकर आधा मैं
पूरा हो जाता हूँ
तेरी मुस्कराती आँखे देख
मैं चैन से सो जाता हूँ

जब तू और जी सकता है फिर काहे को तू मरे
आ हम तुम मिल कर चाहतों का व्यपार करें 

Friday, July 4, 2014

"हैप्पी मानसून"




एक हल्का सा बादल देख कर तोड़ लेना है 
और बना देने है उससे, तुम्हारी कानों के झुमके 
इक बारिश की लड़ी तुम्हारे पैरों में पहनानी है 
और अंगुली में टूटे हुए बादल का छल्ला !
हरे पत्तों पर पड़ी बूंदों को उठा कर तुम्हारी कलाई में पहना देनी है हरी चूड़ियाँ 
इक काले बादल को स्पर्श कर तुम्हारे नैनों का श्रृंगार करना है 
सूरज के आईने में बरसती बूंदों से तुम्हारी साडी में सतरंगी रंग भरना है 

तुम्हे सजाना है एक एक बादल को चुन 
और ऐसे बनाना है अपना "हैप्पी मानसून"

Thursday, May 22, 2014

बस यूँही जन्म लेने से एक दिन पहले :)



न मंजिल का पता है, न रास्तों की खबर है ;)
थकी मांदी  सी रात है , मन मौजी सहर है 
मैं जिस से भी मिला , अपना बन कर मिला 
फिर भी जाने क्यों अब तक अंजाना ये शहर है 
न मंजिल का पता है, न रास्तों की खबर है ;)

मैं जिन से दिल से जुड़ा , उनसे कभी न रूठा 
और जिस से दिल से रूठा , फिर उससे कभी न जुड़ा 
फूलों वाला जो दरख्त दीखता है दूर से 
असल में वो काटों वाला "शजर" है 
न मंजिल का पता है, न रास्तों की खबर है ;)

पूरी है जिंदगी पर प्यार अभी भी बाकी है 
उस एक नशे को खोजता अब तक ये साकी है 
मुकम्मल है आईना  मेरा, कुछ चेहरों पर फिर भी नजर है 
न मंजिल का पता है, न रास्तों की खबर है ;)

मेरे बहीखाते को मत रखना तुम देर तक सवालों में 
दो आँखों का  सुकून  और चार लबों पर खुशियाँ 
बस यही  जोड़ा है, गुजरे हुए सालों में। .. :)
जब वो रोती आँखों से मुस्करा देते है, हमें याद कर 
तभी झूमती गाती  अपनी भी सहर है 
न मंजिल का पता है, न रास्तों की खबर है ;)

और चलते चलते 
के अब तक रखा है , आगे भी साथ रखना 
अपनी हर दुआ में , मुझे याद रखना 
खुश हूँ अब तक क्यूंकि आप की दुआओं में बड़ा असर है 
न मंजिल का पता है, न रास्तों की खबर है ;)



Wednesday, January 15, 2014

उसकी डायरी के पन्ने....!

उसकी डायरी के पन्ने ...

मुझे आईना  दिखा रहे थे
मैं कितना खुदगर्ज हूँ ये बता रहे थे
उसके हर शब्द में खालिस सच्चाई थी
मेरे संग भी उसके जीवन में तन्हाई थी ?
उसके शब्द मुझ पर अपना हक़ जाता रहे थे
मैं कितना खुदगर्ज हूँ ये बता रहे थे :)

उसकी डायरी के पन्ने। . :)

तूफ़ान सा उठ रहा था सर्दी कि उस  रात में
मैं डूब चूका था सर तक, कागज पर फैले जज्बात में
उसके शब्द मेरे दामन पर  कालिख लगा रहे थे
पर मेरे चेहरे पर पड़ी धुल हटा रहे थे
मैं कितना खुदगर्ज हूँ ये बता रहे थे :)

उसकी डायरी के पन्ने ..

हम खूबसूरत धोखों में अब तक यूँ ही उलझते रहे
जमीर बेच कर खुद को जमीदार समझते रहे
आज उसके शब्द , सच्चे प्यार का मोल समझा रहे थे
मैं कितना खुदगर्ज हूँ,  ये बता रहे थे :)

.

"सच्ची मोहब्ब्त को समझा है
इन  पन्नों से गुजर के हमने। ...
रात भर मेरी आँखों से बरसे है
उसकी डायरी के पन्ने ".…  :)

Friday, September 20, 2013

डायरी का आज का पन्ना , "चाँद को न पाने की कसक"

पूनम का चाँद था छत पर
छूने को दौड़ पड़ा
पर भूल गया था की यह भी
सूरज की बिरादरी का है !

अब हाथ जला बैठा हूँ
और ये छाले, दिमाग की एक नस को
उम्र भर तननाए रखेंगे !

चाँद, खुबसूरत दूर से ही है
पास जाओगे गड्डों, में समा जाओगे
इतनी जिद मत करो उसे जानने की उसको पाने की
कहीं ऐसा न हो , तुम्हरा भविष्य चाँद से मरहूम रह जाये

Wednesday, September 11, 2013

फिर तेरी कहानी याद आई




तुम्हे याद करने के, बहाने निकले है
फिर कुछ गीत, पुराने निकलें है |

कागज , कलम , लफ्ज लिए हाथ में मैंने
हम फिर से , तुझ पर गजल बनाने निकलें है |

तेरी तस्वीर को यूँ ही नहीं छुपाया किताब में
तुझे ज़माने की नजरों, से बचाने निकलें है |

पीता नहीं हूँ, पर मयखाने का पता जानना है
क्यूंकि यारों की महफ़िल, सजाने निकलें है |

बन्दुक ली है , रखा सिन्दूर भी है हाथ में
जरुर कोई रस्म निभाने निकलें है |

तुम्हे याद करने के, बहाने निकले है
फिर कुछ गीत, पुराने निकलें है |

Friday, May 3, 2013

ओनी पोनी जिन्दगी ..

ये जिन्दगी ...
जो कभी कहानी तो कभी गजल रही है ..!
कभी मछली सी ...
हाथो में है , जीने के लिए मचल रही है !! 

कभी गीली साबुन सी ..
पकड़ना चाहो तो भी फिसल रही है !

कभी थक कर बैठ रही , कभी ख़ुशी से उछल रही है 
ये जिन्दगी जो हर पल बदल रही है ...
जितना जीया इसे, उतना हाथ से निकल रही है !

ओनी पोनी जिन्दगी , 
आधा इंच ख़ुशी और एक इंच गम के बीच चल रही है ..
गिर रही है संभल रही है !! 

Saturday, April 20, 2013

दो शक्लों वाला बलात्कार...







ये दो शक्लों वाला बलात्कार मुझे पचता नहीं है

तुम्हारी राजधानी में हुआ बलात्कार अत्याचार है 

और हमारे कस्बें में हुआ बलात्कार चंद रुपयों का व्यपार है ?

सिर्फ इसलिए की वहां मीडिया है, हाई प्रोफाइल लोग है |

लाखों मोमबत्तियां और करोडो "मेल" फेशन में आ जातें है ||

चार दिन सार देश आँसूं बहाता है 
और फिर पांचवे दिन ipl का नाच दिखाता है !

हमारे अख़बारों में स्त्रियाँ रोज दम तोड़ती है
रोज चीथड़े चीथड़े होता है बचपन
पर किसी के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती ?
बड़ी "ढीट" व्यवस्था है, सिर्फ केमरे के सामने हिलती है !
अँधा पढ़ा लिखा समाज है , सिर्फ भीड़ का अनुसरण करता है :(

Sunday, January 13, 2013

खबर...









जब उसका जन्म हुआ
सब उसके आस पास थे ....
घेरे थे सब उसको चारों और से
सब उसके अंदर तक झांक लेना चाहते थे
उसके जर्रे जर्रे को.. पहचान लेना चाहते थे
किसी ने देख कर आह किया , किसी ने वाह किया
किसी ने एक दो और जोड़ कर उसे अफवाह किया ||

वो सुर्ख़ियों में रही कुछ दिन ...

दुनियां के आसुओं से उसकी जिन्दगी नम हुई ...
फिर कुछ दिन बीते , भीड़ उसके आस पास कम हुई  ...
जख्म भरने कोई आगे नहीं आया, वो अपने में ही गुम हुई ..

सिर्फ पुराने पन्नों में ,उसकी जिन्दगी छुपी है ...
वो एक "खबर" थी जो अब दम तोड़ चुकी है :)

Saturday, January 5, 2013

सिर्फ इतना सा कर लो ..




सुनो जहमत करो, अपनी सोच को बदलने की जरा सी ...
आज उसका दर्द , जो तुम्हे, महसूस नहीं हो रहा , 
कल वो दर्द, तुम्हे भी हो सकता है 
दर्द को बांधों मत किसी दायरे में ...|

कुछ देर के लिए आईपॉड के इअर फ़ोन को कानों से हटा कर, 
सुन भी लिया करो ..
की कोई दर्द से करहा तो नहीं रहा सड़क किनारे ...?

तुम्हारी आँखें अनदेखा क्यूँ कर देती है ..?
सड़क किनारे सर्दी में ठिठुरते, नग्न आदमी को
धुप से बचने का काल चश्मा , इंसानियत पर क्यूँ लगा लेते हो ?

खून रिसता क्षत विक्षत शरीर जो दिखाई पड़े
भयभीत मत हो , मुहं पोछने का रुमाल रखा है न जेब में माँ ने?
बांध दो उसे ..खून का रंग तुम्हरा भी same 2 same है ।

मोबाइल रखते हो न हाथ में ,जिसे तुम छेड़ते रहते हो बात ही बात में?
KBC का नंबर भी SAVE होगा उसमे ?
उसमे 108/100 भी save कर के रखो ..
हादसे के वक्त अमिताभ से ज्यादा, एम्बुलेंस काम आती है ...

सिर्फ इतना सा कर लो ,
क्यूंकि मोमबत्तियों जलाने से देश रोशन होता यदि
तो आजादी के 65 वर्षों बाद भी हम अंधेरें में नहीं "जी" रहे होते |
आहुति देता है चाँद , तब जा कर रोशन सवेरा होता है
जलाना पड़ेगा खुद को भी और दिमाग की बत्ती को भी, मोमबत्ती की तरह :)

Monday, November 12, 2012

रस्म निभाने के लिए दिवाली है ...

"
अपने घर का कचरा , सड़क पे डालने के लिए 
दिवाली है ...
मिलावट की मिठाइयाँ , गरीबों को बांटने के लिए 
दिवाली है ..

बेजुबान जानवरों को सताने के लिए 
दिवाली है 
फटाके फोड़ के , प्रदुषण फ़ैलाने के लिए 
दिवाली है ..

गर सरकारी अफसर हो आप तो 
जम कर खाने , के लिए दिवाली है ...
गर हो दुकानदार, तो थोडा बहुत 
कमाने के लिए दिवाली है ...

अजनबियों से मेल मिलाप बढ़ाने के लिए
दिवाली है 
"दीया तले अँधेरा" यह जताने के लिए 
दिवाली है ...

दीप नहीं, दिल जल रहें है, ये बताने के लिए 
दिवाली है ..
चकाचौंध से लोगो को भरमाने के लिए 
दिवाली है ..

साल भर के गम छुपा के , दो दिन मुस्कराने के लिए 
दिवाली है ...
ना वनवास ख़त्म करने की चाह है , और ना ही राम बनने की ललक 
अब तो सिर्फ और सिर्फ रस्म निभाने के लिए 
दिवाली है ...||

Saturday, September 29, 2012

खाली हाथ ...



सूरज आता खाली हाथ ... चाँद खाली हाथ जाता है 
कुछ खुशियाँ खोजने में ...पूरा दिन निकल जाता है ||


इस कद्र पड़ी है महंगाई की मार सब पर 
अब आम दिनों सा... त्यौहार निकल जाता है ..||

झूठे वादें झूटी कसमें और बेफिजूल की रस्में 
इन्ही चक्करों में सबका संसार निकल जाता है ||

जेब में जब आ जाता है गाँधी उनके ..
मन से उनके गाँधी बनने का विचार निकल जाता है||

लाख चाहता है हर एक ..."अन्ना" के रास्ते पर चलना 
पर जिन्दगी की रेस में ..आगे... भ्रष्टाचार निकल जाता है ||

चारों और से मजबूर आँखें ....जब शौर करती है 
तब वो आँख पर पर्दा कर ....घर से बाहर निकल जाता है ||

चाहता तो  मैं भी हूँ उसके लिए ताजमहल बनवाना 
कांग्रेस के दौर में फटी जेब से... सारा प्यार निकल जाता है :)

Wednesday, July 25, 2012

आखिर क्या देख रहा है ?


गुवाहटी कि शर्मनाक घटना के बाद , यशवंतपुर मैसूर ट्रेन में एक लड़की के साथ वही हरकत दोहराई गयी , लेकिन समाज मीडिया और आम जन सिर्फ ख़ामोशी से तमाशा देख रहें है :) जागो इंडिया जागो ||

जिस के आँचल में पल कर.. बड़ा हुआ जग  
आज उजड़ता हुआ उसका बदन , तार तार देख रहा है 

दिमाग  पर काला चश्मा लगा कर 
 हर व्यक्ति ये समाचार देख रहा है ?

वो जो शख्स आँखों से , स्त्री पर अत्याचार देख रहा है
वो अपनी ही  मौत का इंतजार देख रहा है !!

दूध का कर्ज चुकाएगा क्या कोई ?
यहाँ हर शख्स स्त्री का व्यपार देख रहा है ||

मंदिर में देवी को पूजने वालों , बंद करों ड्रामा 
तुम्हारा असली चेहरा, सारा  संसार देख रहा है 

हर पुरुष के रगों में स्त्री के खून का कतरा ?
आज खुद से खुद का ही,  बलात्कार देख रहा है ?

चुल्लू भर पानी ना मिले , तो चूड़ियाँ पहन लो 
वो हर शख्स जो मजे से, शिकार देख रहा है | 

independent देश के वीर जवान impudent हो गयें है ? 
अँधा समाज/ कानून  एक जैसी हरकतें बार बार देख रहा है |

वो जो शख्स खुली आँखों से , स्त्री पर अत्याचार देख रहा है 
वो अपनी ही  मौत का इंतजार देख रहा है !!


Monday, July 23, 2012

पांचवी गजल

उसकी हर हरकत का हिसाब रखते है
हम दिल में,  मोहब्बत की किताब रखतें है !!

वो चेहरे पर चाँद लिए घुमती है
हम आँखों में.. हमेशा रात रखतें है |

जब भी मिलें हमसे ..बैचैनी से मिलें वो
इसलिए हर बार, अधूरी मुलाक़ात रखतें है ||

पतझड़ में भी सावन सी बदली हो जाये
अपने शब्दों में... हर वो बात रखते है ||

कुछ थामना चाहेगी , जब थक जायेगी ज़माने से
इसलिए , हम ...हमेशा ...खाली हाथ... रखतें है

जाने कब उसकी पलकों से उतर आयें जिन्दगी
एक अधुरा ख्वाब  हमेशा साथ रखतें है !!

उसकी हर हरकत का हिसाब रखते है
हम दिल में,  मोहब्बत की किताब रखतें है !!

Monday, July 16, 2012

माँ ... मुझे ना दे जन्म ...


माँ 
मुझे ना दे जन्म ...
मैं यूँ मर मर के,  जी ना पाउंगी 
अच्छा होगा यदि कोख में ही मर जाउंगी !! :).....

माँ , जब चाहा पापा ने अपना गुस्सा तुझ पर उतारा 
वजह- बेवजह तुझ को मारा !!
तू चुप कर के , जो सहती है , मैं सह ना पाउंगी 
अच्छा होगा,  यदि कोख में ही मर जाउंगी !! :).....

माँ,  जब तू ऑफिस से आने में दो घंटे लेट हो जाती है 
घर पर सब का पारा गर्म हो जाता है 
हजारों अनचाहे सवालों का जन्म हो जाता है 
तू जिन सवालों को सुलझाती है , मै सुलझा ना पाउंगी 
अच्छा होगा , यदि कोख में ही मर जाउंगी !! :).....

माँ , गैर मर्दों की आँखों में , तेरा वहशियत को पढना 
रात में, सडक पर तेरा,  तेज क़दमों से चलना 
तू जितना डर कर चली है , मैं चल ना पाउंगी 
अच्छा होगा,  यदि कोख में ही मर जाउंगी !! :).....

माँ कहने को तो सांस लेने का अधिकार है तुझे 
पर किसे पता है , कितना कर्ज दिल पर रख कर, तू मुस्कराती है ?
अपनों का भविष्य बनाते बनाते, खुद मिट जाती है !!
तुने खोया अपना वजूद , मै खुद को खो ना पाउंगी !
अच्छा होगा, यदि कोख में ही मर जाउंगी !! :).....
माँ,  मैंने देखा है,  हर बार तुझे ...अपने मन को मारते हुए 
अपनों के हाथों ही हारतें हुए !!
हर कदम पर समाज-घर वालों का.. तुझे टोकते हुए  !
अपनी हर इच्छाओं को, खुद से रोकतें हुए !!
मैंने देखा है तुझे ...
अपने सपनों को खोते हुए , अक्सर छुप छुप कर रोते हुए,
 "स्त्री होने का एक अनचाहा बोझ ढोतें हुए" 
 तू जितना डर कर जी ली है,  मै जी ना पाउंगी 
अच्छा होगा , यदि कोख में ही मर जाउंगी !! :).....
 

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