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Friday, September 20, 2013

डायरी का आज का पन्ना , "चाँद को न पाने की कसक"

पूनम का चाँद था छत पर
छूने को दौड़ पड़ा
पर भूल गया था की यह भी
सूरज की बिरादरी का है !

अब हाथ जला बैठा हूँ
और ये छाले, दिमाग की एक नस को
उम्र भर तननाए रखेंगे !

चाँद, खुबसूरत दूर से ही है
पास जाओगे गड्डों, में समा जाओगे
इतनी जिद मत करो उसे जानने की उसको पाने की
कहीं ऐसा न हो , तुम्हरा भविष्य चाँद से मरहूम रह जाये

1 comment:

राकेश कौशिक said...

दूर के ढोल सुहावने - सार्थक प्रस्तुति

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