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Wednesday, June 15, 2011

दो पल का साथ ...


वो जान के मुझको , मुझ से यूँ अनजान हो गया ..
खुदा देखा था जिस शख्स में मैंने, वो भी इंसान हो गया |
गुलिस्ताँ था गुलशन तेरे आने से पहले....
इक तेरे आकर के चले जाने से, वीरान हो गया ||
खुदा देखा था जिस शख्स में मैंने, वो भी इंसान हो गया |

यहाँ मौत भी कहा अपनी मर्ज़ी से मिलती है |
फिर हमें भी ऊपर वाले ने ही मिलाया होगा ?
चार दिन कि चांदनी , दो पल का साथ ,
ये सभी रंग देख के, मै भी हैरान हो गया
खुदा देखा था जिस शख्स में मैंने, वो भी इंसान हो गया ||

यूँ तो अपना हर ख्वाब टूट ही जाता है सुबह से पहले
मंजिल तक भी कोई साथ चलता नहीं .....
हर मोड़ पे मिलते है मुसाफिर , अपना लाखों में एक मिलता नहीं
शायर तेरे जाने से , इक पल को परेशान हो गया ...
खुदा देखा था जिस शख्स में मैंने, वो भी इंसान हो गया ||

इन शब्दों कि आहट , तुझ तलक भी पहुचें ...
क्यों हुआ , क्या हुआ तू भी बैठ के सोचे...
तुझे तो अहसास भी न हुआ , तेरे गुनाह का
पर तू जहाँ -२ से गुजरा, बेवफाई का फरमान हो गया
खुदा देखा था जिस शख्स में मैंने, वो भी इंसान हो गया ||

3 comments:

वन्दना said...

वो जान के मुझको , मुझ से यूँ अनजान हो गया ..
खुदा देखा था जिस शख्स में मैंने, वो भी इंसान हो गया |
गुलिस्ताँ था गुलशन तेरे आने से पहले....
इक तेरे आकर के चले जाने से, वीरान हो गया ||
खुदा देखा था जिस शख्स में मैंने, वो भी इंसान हो गया |

वाह बहुत ही गहरी बात कह दी…………दिल को छू गयी।

Aparajita said...

दिल को छू गयी एक - एक लाइन
बहुत बहुत बहुत ही खूबसूरत कविता
और बहुत ही मर्मस्पर्शी

आशुतोष की कलम said...

यूँ तो अपना हर ख्वाब टूट ही जाता है सुबह से पहले
मंजिल तक भी कोई साथ चलता नहीं .....

मजिल तक वो क्या पहुचाये
जिसने देखि रह न चल के......आना और जाना तो अकेले ही है बंधू ...हौसला रखें

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