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Friday, April 22, 2011

गुजरात दंगो का दर्द ...


मुझे पता है क्या हुआ था उस रात को ,
लेकिन मैं भूल जाना चाहता हूँ हर उस बात को ,
क्यूंकि उस हर बात से मेरे जख्म हरे होते है
उस खुनी शाम को याद कर मेरे सपने आज भी डरें होते है ||

क्या होगा कब्रों को फिर से जिन्दा कर के ?
हजारों बेगुनाहों कि लाशों को बार बार शर्मिंदा कर के ?
राजनीती ने लाशें बिछाई है ,अब मुझे लाशों पे राजनीती नहीं चाहिए
मुझे हर सफ़ेद कपड़ा कफ़न नज़र आता है ,अब मुझे किसी कि सहानुभूति नहीं चाहियें ||
वो एक तूफ़ान था जो उड़ा ले गया सब कुछ ...
अब चिंगारी को फिर से हवा दे के फिर से आग न लगाइए
मकान पक्के बन चुके है, फिर से उनकी नीवें हिलाने मत जाइए ||

तू सही था या था तू गलत मुझे उस से अब सरोकार नहीं
क्यूंकि मैं जानता हूँ ऊपर वाले कि लाठी को आवाज़ कि दरकार नहीं ||
मैं तरक्की पसंद मुल्क चाहता हूँ , मैं जीना चाहता हूँ अमन चैन से...
तू अपने आप को कितना भी बड़ा समझ ले ,
पर ध्यान रख कोई बच नहीं सकता उसके तीसरे नैन से ||

2 comments:

संजय भास्कर said...

मैं क्या बोलूँ अब....अपने निःशब्द कर दिया है..... बहुत ही सुंदर कविता.

ana said...

bahut sundar likha hai aapne....abhar

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