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Sunday, October 16, 2011

मै तेरे शहर में नया हूँ ...|

मै तेरे शहर में नया हूँ
इसकी आबो हवा में, मुझे घुल जाने दे
मैं खुद से, खुद का, पता जानने निकला हूँ
मुझे किस्मत को आजमाने दे ||

सुना है अलग है तेरा, शहर मेरे शहर से
पर चाँद और सूरज का ठिकाना तो वोही है ?
लोग होंगे पराये , परवाह किसे है ?
मुझे चाँद सूरज से ही, रिश्ते निभाने दे ||

मै तेरे शहर में नया हूँ
इसकी आबो हवा में, मुझे घुल जाने दे ||

बड़े तहजीब का शहर है तेरा
यहाँ "सर" कह कर लोग, घर में घर कर लेते है
मुझे भी सर छुपाने के लिए, इक सर बनाने दे ||

मै तेरे शहर में नया हूँ ..
इसकी आबो हवा में, मुझे घुल जाने दे ||

तेरे शहर के लोग बड़े अजीब है...
अपनों से दूर है , अजनबियों के करीब है॥||

यहाँ तारुफ़ करने का, तकल्लुफ कोई नहीं करता...|
क़ानून को हाथ में लेने से भी कोई नहीं डरता |
क्यूंकि जिस की जेब मैं जितना पैसा, उतना वो शरीफ है |
गरीबी का जुर्म माथे पे मेरे भी, अबकी मुझे भी शराफत कमाने दे ||

मै तेरे शहर में नया हूँ
इसकी आबो हवा में, मुझे घुल जाने दे

4 comments:

वन्दना said...

वाह आज तो गज़ब की कविता कर दी……………बहुत पसन्द आई।

S.N SHUKLA said...

बहुत प्रभावी रचना , बधाई.


कृपया मेरे ब्लॉग पर भी पधारने का कष्ट करें.

sushma 'आहुति' said...

बहुत ही सुन्दर रचना....

सागर said...

मै तेरे शहर में नया हूँ
इसकी आबो हवा में, मुझे घुल जाने दे
मैं खुद से, खुद का, पता जानने निकला हूँ
मुझे किस्मत को आजमाने दे ||bhaut hi sundar...

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