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Tuesday, February 8, 2011

कोना ..!!


घर के एक "कोने" में सिमटी हुई, मुरझाई सी... मेरी जिन्दगी
खुद के होने का अहसास तेरी आँखों में ढूंढती,..घबरायी सी मेरी जिन्दगी
जिस दिल में घर बनाने, निकले थे घर से हम....
उस दिल के एक "कोने" में कहीं सिसकती हुई, लडखडाई सी मेरी जिन्दगीं.. ||
घर के एक "कोने" में सिमटी हुई मुरझाई सी... मेरी जिन्दगी ...

मेरे नसीब ने मुझे दिया सिर्फ "कोना"...
मेरे, तेरे जीवन का जरुरी हिस्सा है अब ये "कोना"...
कभी आँखों को अखरता "कोना" तो कभी दिखावें को सजता संवरता "कोना"
कभी बारिश से बचाता "कोना" तो कभी अँधेरे से डराता "कोना"
खोयी हुई चीजों को मिलाता "कोना" नए रिश्तों को बनाता "कोना"
कुछ हसीं ख्वाब आँखों मे सजाता "कोना"...पूरे घर का बोझ अपने कंधो पे उठाता "कोना"

उसी "कोने" में अपने सपनों को हर बार पीछे छोडती, खुद से भागती सी मेरी जिन्दगी ..
रोज टूट - टूट कर खुद को फिर से जोड़ती , एक शिल्पकार सी ...मेरी जिन्दगी ..
मिट चुके अस्तित्व को फिर से बनाती,किसी बंद व्यापार सी ...मेरी जिन्दगी ॥
हर बार अकेलेपन में तुझे बुलाती,चीत्कार सी ...मेरी जिन्दगी
घर के एक "कोने" में सिमटी हुई मुरझाई सी... मेरी जिन्दगी ||
खुद के होने का अहसास तेरी आँखों में ढूंढती,..घबरायी सी मेरी जिन्दगी

Thursday, January 20, 2011

अपील




इस
26 जनवरी कि पूर्व संध्या पे जब प्रधानमंत्री राष्ट्र को सम्भोधित करे , और राष्ट्रपति झंडा फहराए , उससे पहले मेरी देशवासियों से अपील है कि अपने मोबाइल कि कालर टोन , रिंग टोन , फेसबुक, ट्विटर का स्टेटस पे लगा दो ये गाना " सखी सैयां तो खूब कमात है महंगाई डायन खाए जात है "
पूरे भारत में हर एक मोबाइल पे, हर एक तबके के ,हर एक उम्र के लोग तक ये सन्देश भिजवा दो , ताकि लाल किले के कानों में हमारी आवाज़ पहुचें ,उन्हें पता चले कि पूरा देश हाहाकार कर रहा है महंगाई कि वजह से ||
आये दिन बढ़ रहे है भाव पेट्रोल डीजल गेस के , लगभग दोगुने हो गये है दूध , शक्कर , चाय , आटा , दाल के भाव | आलू , प्याज और सभी सब्जियों के भाव आसमान छु रहें है ||
और हमारें नेताओ को फुर्सत नहीं है घोटाले करने से , या खाली बयान बाज़ी करने से , या अपने कुरते में आई सलवटों को ठीक करने से ||
संसद में बैठे हर एक नेता को इस महंगाई से कोई असर नहीं पड़ रहा , असर हो रहा है आम आदमी पे , हम पे ||
देश कि सभी राजनितिक पार्टियाँ सिर्फ हो हल्ला कर रही है इस महंगाई पे लेकिन कोई इसको कम करने के लिए जागरूक प्रयास नहीं कर रहा है , नेताओ को लगता है कि हमारें देश में गरीब अब गरीब नहीं रहा , गरीब के पास पैसा बढ़ रहा है , लेकिन हकीकत में इस महंगाई ने हर एक तबके कि नींद उड़ा दि है ||
अब समय आ गया है कि हम अपने हक़ के लिए खुद लड़ें , और उसके लिए किसी बस को जलाने कि जरुरत नहीं है न ही देश को बंद कराने कि जरुरत है , बस जरुरत है अपनी बात आम से ले कर खास तक पहुचानें कि , और हमे यही करना है ||
इतिहास गवाह है युवाओ ने देश में हमेशा क्रांति कि अलख जगाई है , जब युवा जागा तो फिरंगियों को भी देश छोड़ के जाना पड़ा , तो ये महंगाई तो हमारे चंद लोगो द्वारा बनायीं गयी है इसे हम क्यों नहीं भगा सकते , मिटा सकते ?
जागो देश जागो , जागो देशवासियों ||

एक महंगाई पीड़ित
विजय पाटनी, नसीराबाद , राजस्थान ||

Wednesday, January 5, 2011

दो दीवारों सी जिन्दगी..



दो दीवारों सी हो गयी है जिन्दगी हमारी;
न तुम्हे दिखते है आँसू मेरे ,और न ही मुझे सुनाई देती है धडकन तुम्हारी ||
दो दीवारों सी हो गयी है जिन्दगी हमारी ||
में बाहरी हिस्से की वो दीवार जिसे सहना है वक्त के हर थपेड़े को ,
और बचाना भी है अपने आप को कालिख से;
मुझे सहना है हर एक की घूरती नजरो को भी ,
और इस दीवार के पीछे जो मेरे अपने है ,
मुझे बचाना है उनके वर्तमान को , और सवांरना है उनके भविष्य को भी ||

मेरा इम्तिहान यही खत्म नहीं होता... ,
अभी तो मुझे तुम्हारी प्रतिस्पर्धी निगाहों में भी अपनी जगह बनानी है |

क्युकी तुम हो अन्दर की वो सुन्दर दीवार, जिसकी आँखों में खटकती है मेरी बदसूरती ||
तुम्हे तो मेरे वजूद का अहसास तक नहीं है , क्युकी तुम अपने ही मद में मस्त हो ,
तुमने कभी मेरी नीवं की तरफ नज़र नहीं की, और न ही सराहा कभी मेरी मजबूती को ,

न जाने तुम कब समझोगे ...

तुम्हारे इस स्वरूप को बनाये रखने के लिए मैंने अपने कितने अरमानो को धुल में मिलाया है
और शायद इसी आस लिए हम फ़ना हो जायेंगे ,कि कभी तो बदलेगी नज़रें तुम्हारी ||

दो दीवारों सी हो गयी है जिन्दगी हमारी;
न तुम्हे दिखते है आँसू मेरे ,और न ही मुझे सुनाई देती है आवाज तुम्हारी ||


Saturday, January 1, 2011

हसरतों को नए पंख लगा लीजिये...


एक दशक और समाप्त हो गया और एक और साल यूँही पलक झपकते बीत गया ||
चलो जाने वाले साल को अपनें सारे गम दे दें , उसे अपने सारे जख्म दे दें ...
नया साल बस आप के चेहरे पर मुस्कान देखना चाहता है,
चलो उसे ....ख़ुशी से आँखे नम दे दें ||
आप का साथ , और आप लोगो का आशीर्वाद हमारे इस ब्लॉग को पिछले साल खूब मिला है , उस के लिए आप सभी का हार्दिक धन्यवाद आशा है इस वर्ष भी आप का साथ हमे इस तरह मिलता रहेगा

नव वर्ष आप के लिए सुखमय मंगलकारी हो और इस नए दशक में आप के सभी सपने पूरे हो ||
हैप्पी न्यू इयर २०११


हसरतों को नए पंख लगा लिजियें ,कुछ नए सपने आँखों में समा लिजियें
ग़मों रंज कि स्याही को खत्म कर के यहीं,
नव वर्ष के पन्नों को अपनी मुस्कराहट से सजा लिजियें ||
हसरतों को नए पंख लगा लीजिये ||
आप सुखी रहे संपन्न रहें , कामयाबी आप के कदम चूमे ,
नए वर्ष में आप हर दिन खुशियों में झूमे,
जो दुआ देते है मन से ,अपनी तरक्की में उन्हें भी शामिल कीजिये ||
हसरतों को नए पंख लगा लीजिये ||
सुना है समय बड़ी तेजी से बदल जाता है ..?
पलक झपकते ही बदल जाते है सपनें,और अपनें भी
अपनों को व्यवहार से और सपनों को प्यार से करना है साकार
बस समय के साथ कदम से कदम मिला लीजिये
हसरतों को नए पंख लगा लीजिये ||
सूरज सा चमकें आप , और चाँद सा दमकें आप ,ख्याति फेलें तारों सी चारों और आप कि ,
दुनिया होगी आप के क़दमों में सोच को अपनी बदल लीजिये
हसरतों को नए पंख लगा लीजिये ||
नव वर्ष के पन्नों को अपनी मुस्कराहट से सजा लिजियें ||
happy new year 2011

Friday, December 17, 2010

शीला की जवानी



महगांई ने लूटा सब का चैन , दो जून की रोटी भी मन को कर रही बेचैन ,
आलू
, प्याज, टमाटर, भिन्डी ,के भाव सुन आँखों में आ जाता पानी ||
अब जख्मों पे मरहम लगाती ... सिर्फ शीला की जवानी ॥

"कांग्रेस" का "हाथ" ..गरीब के साथ का था वादा,
गरीब के तन से कपडा उतरा , अब वो शरीर से हो गया आधा॥
ये हाथ इतना भारी पड़ा है की हर एक हाथ फैलाये खड़ा है ,
रोती आँखे भूखा पेट हर गरीब की निशानी ...
लाल किले के कानों तक कोई पहुचां दे ये कहानी

अब जख्मों पे मरहम लगाती ... सिर्फ शीला की जवानी ॥

गांधी अब हमारी कुटिया में नहीं आते ..
वो तो अफसरों , नेताओं ,रसूखदारों , अमीरों के यहाँ डेरा जमाए है,
जब भी हमने अपनी जेब में हाथ डाला, बस चंद सिक्के ही पाए है ||
वो भी हमने अपनी बीवी और बच्चो से छुपाये है ,क्योंकी अभी पुरे माह से है निभानी॥
अब जख्मों पे मरहम लगाती ... सिर्फ शीला की जवानी ॥

भला हो शीला तेरा , तुझे देख के कुछ पल ख़ुशी के जी लेते है ,
बहला लेते है मन को... और आँसू को पी लेते है!
वरना 'मनमोहन' के राज ने सब को याद दिला दी नानी...
अब जख्मों पे मरहम लगाती ... सिर्फ शीला की जवानी ॥

Saturday, December 4, 2010

मैंने देखा इस साल में ...



मेरी नजरो से पूरे साल का हाल ...
मैंने देखा इस साल में ...
विदेशों में अपनों का खून बहते हुए , अपने घरों में लोगो को सहमे सहमे रहते हुए
बेकरी में लोगो को तड़पते देखा , मंदिर से लाशों को उतरते देखा ॥
हजारों को चिरनिद्रा में ले गयी रेल , अरबों के घोटाले दे गया कॉमन वेल्थ खेल ,
महंगाई ने छिना आम आदमी का चैन , भारी बारिश फिर कर गयी बैचेन ॥

मैंने देखा इस साल में ...
प्यार करने वालो को समाज के हाथों मरते हुए .... आतंकवाद से ज्यादा नक्सलियों से लोगो को डरते हुए ॥
सड़ता हुआ अनाज देखा गोदामों में , भूख से बिलखती जिन्दगी शमशानों में,
अकेलेपन से( विवेका बाबाजी) घुट के किसी को मरते देखा , हर तरफ स्त्री को वासना भरी नजरो से डरते देखा ॥
जनता को जागते देखा साम्प्रदायिक ताकतों को पतली गली से भागते देखा
मिलते देखा मैंने अल्लाह और राम को , दुनिया का 'दबंग'(ओबामा ) भी मान गया मेरे नाम को ॥
मैंने देखा मुन्नी को बदनाम होते हुए , शीला को जवान होते हुए
मेरे हालात पे काली पट्टी पहने सफ़ेद पुतले को रोते हुए ॥

मैंने देखा इस साल में ...
माटी के दो लालों(बसु / शेखावत) को माटी में मिलते हुए ...
काम करने वालों के सर पे ताज और बाहुबलियों के हाथों से सत्ता को निकलते हुए ॥
मैंने देखा इस साल में ...
"आदर्श" नेताओं के चेहरे काले , गरीब प्रजा के अरबों रुपये "राजा" के हवाले
जख्म हर हिस्से में मेरे, गुजारिश फिर भी इतनी... इस भ्रष्ट तंत्र को फिर से कोई "बापू" संभाले!!
में टूट चूका हूँ क्युकी मेरे सिपहसलार ही मुझे लूट रहे है ,सपने मेरे 'सोने की चिड़िया' के पीछे छुट रहे है
गम ही गम है मेरे चारों और किसे सुनाऊं अपने अश्को का शोर ?
उम्मीद है मेरे दामन में कुछ पल खुशियों के लाएगी आने वाले साल की पहली भौर... !!

Wednesday, November 17, 2010

अपील :- जियो और जीने दो..


ये उस बेजुबान जानवर की अपील है जो शायद यदि बोल सकता तो आज इन्सान को इंसानियत का पाठ पढाता उन्हें जियो और जीने दो सिखाता ...

मैं मस्जिद गया मुझे अल्लाह मिला , मंदिर गया भगवान मिला
इंसान की तलाश में जब भी निकला मुझे हर शख्स हैवान मिला !!
मुझे मार कर के ये, अपने इंसान होने का दम भरते है ?
इतना प्यारा है इन्हें तू , फिर अपने जिगर के टुकड़े को क्यों नहीं तेरे नाम करते हैं ?
मेरे खून से लिख रहा है आज हर शख्स खुशियों की इबारत ....
तेरे ही नाम पे हो कुर्बानी हमारी, तो कोंन करेगा हमारी इफाजत ?
आलम है अब ये, जब भी लिया तेरा नाम किसी ने, मेरा पूरा कुनबा परेशां मिला ...
जिस दर से जी जाते है मुर्दे , उसी पाक दर में मुझे मेरा क़ब्रिस्तान मिला
इंसान की तलाश में जब भी निकला मुझे हर शख्स हैवान मिला !!
ऐ खुदा ये अपील है मेरी, मुझे किसी भी जीवन में इंसान मत बनाना
में तेरा नाम ले कर के किसी का खून बहा नहीं सकता
ऐसे कुर्बान हो के में खुश कर रहा हूँ इन्हें..
इंसान बन के में किसी के काम आ नहीं सकता !!
लगता है यूँ , ये जीवन मुझे इनाम मिला ...
इंसान की तलाश में जब भी निकला मुझे हर शख्स हैवान मिला !!
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