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Tuesday, April 20, 2010

बारिश


सूरज की बाद्लों से आँख मिचोली चल रही है ..
तपती धरती को बारिश की ठंढी फुहारे मिल रही है !!

सब खुश है चारो और ...बस एक हमे छोड़ कर
हमे तो इस मोसम में बस आप की कमी खल रही है !!
तपती धरती को बारिश की ठंढी फुहारे मिल रही है !!!

आप आयेंगे नही आप को ख्याल ही कहा है हमारी खुशी का ॥
आप की और भी कुछ बादल कर दे हवा से हमारी बात चल रही है !!
तपती धरती को बारिश की ठंढी फुहारे मिल रही है !!!

बारिश की बूंन्दे कुछ इस तरह से गिरी है तन पे ..
जैसे आप ने छुहा हो हमे प्यार से .... आ जाओ अब तो ये रात भी ढल रही है !!
तपती धरती को बारिश की ठंढी फुहारे मिल रही है !!!

इसे आप शिकायत मत समझना ..हम नाराज़ नही है आप से ..
बस ये तो हमारी तमन्नाये है जो मचल रही है !!
तपती धरती को बारिश की ठंढी फुहारे मिल रही hai !!!

Saturday, April 17, 2010

दादी आ रही है ......



सुधा collage जाने को तैयार हो ही रही थी ... की तभी फ़ोन की रिंग बजी
फ़ोन सुधा की कजिन का था ...उस ने कहा दादी आज वहा आ रही है तुम स्टेशन चल जाना लेने को ॥
ये सुनते ही सुधा की आँखों के सामने फिर से वो पुराने कड़वी यादे घुमने लगी .......
भारी मन से collage को निकली रस्ते में उस की सहेली उमा मिल गई
उमा : क्या हुआ सुधा बहुत परेशान लग रही हो ?
सुधा : हा यार दादी आ रही है आज
उमा : ओह राम जी दादी ( उमा को भी दादी की आदतों की जान कारी थी )
(सुधा की दादी वैसे तो बहुत धर्मात्मा है दिन भर पूजा पाठ में लगी रहती है....दान धरम में आगे रहती है
अपना काम भी ख़ुद ही करती है वो अपने कपड़े धोने से लेकर खाना बनाना तक !!उम्र के ६५ बसंत पार हो चुके है पर आज भी बच्चो जैसी फुर्ती है उन में !!)
बस दादी चुप नही रह सकती वो जरूर सब पर अपने राय थोपेगी ... सब को अपने हिसाब से चलने को बोलेगी
हर बात में हर इन्सान में कमी निकलना उन की आदत में है )
सुधा : उमा हाँ यार दादी आज आ रही है ,अब फिर से रोज की चिक चिक चालु हो जायेगी माँ और दादी के बीच !!

फिर से पुरे मोहल्ले को पता चलेगा की इस घर में जानवर ही रहते है दिन भर शोर सुनाई देगा सब को हमारे घर से
!!

uma : दादी को रहने को खाने पिने को कोई कमी नही है भगवन की दया से बड़ा परिवार है सब बच्चो के
बड़े बड़े मकान है ...दादी चाहे तो सब को आर्डर दे के अपना काम करा सकती है , लेकिन पता नही क्यो वो ख़ुद काम करना चाहती है अबभी?? पता नही उन को अब भी क्यो मोह माया से लगाव है इतना ?? क्यो वो धरम धयान में मन नही लगाती पुरा !!!??

क्यो हर जगह अपने बहु बेटो का मजाक बनाने में लगी रहती है .??.. जब की सब बेटे बहु इतना धयान रखते है उन का !!

सुधा : चुप है उस को समझ नही आ रहा क्या जवाब दे वो इन सवालो का ??
वो ख़ुद ये जाना चाहती है की क्यो बुजुर्ग लोग उम्र के इस पड़ाव पे आकर बच्चो से दूर हो जाते है ?? क्यो वो अपना सव्भाव नही बदलते ? वो क्यो चाहते है की लोग उन के हिसाब से चले जो की मुमकिन नही है नई पीडी के लिए॥

ये कहानी है उन सब की जिन घरो में बड़े बुजुर्ग आज भी अपना रौब चलाते है बच्चो पे .... अपने बहु बेटो में कमी निकलना ज़माने भर में उन की बुराई करना आदत बन गई है , जिन को ऐसा लगता है की अगर हम ने अपना रौब छोड़ा तो हमारा बुढापा ख़राब हो जायेगा ?

में यह नही कहता की बुजुर्ग है तो उन को कोने में पटक दो एक ...और भूल जाओ नही !!! लेकिन उन को ये समझना जरूरी है की अब समय आ गया है की हम किसी को अपने हिसाब से न चलाये बल्कि कुछ परिवर्तन
अपने में लाने की कोशिश करे ....सीधा खड़ा हुआ पेड़ जड़ से उखड जाता है लेकिन अगर वो फल के बोज से झुका हो तो नही गिरता !! कभी कभी झुकने में भी मान बढता है .....

अपने विचार देते रहे .....

Monday, April 12, 2010

जिन्दगी की किताब


मेरी जिन्दगी की किताब में कुछ पन्ने ऐसे जुड़े है ....जिन को मेरे अपने पढ़ के भी नही समझ पाये !!

और गेरों ने दूर से देख के ही जिन को समझ लिया ....

कोन कहता है खून के रिश्ते दिल के सब से ज्यादा करीब होते है ....

इस दुनिया में जिन के दोस्त नही है आप से ......वो लोग सब से ज्यादा गरीब होते है !!

आप ने उन पन्नो को पढ़ा ही नही है ..समझा है और दिल में उतारा है ...

और अपनी भावनाए भी जोड़ी है उन पन्नो के साथ ...

वो पन्ने जिन को देखना भी अपनों का नही गवारा है ॥

आप ने अपने प्रेम से उन को सवांरा है !!

वो पन्ने कूड़ा या रद्दी बन जाते अगर आप उन को नही अपनाते ॥

आप ने उन को संभाला है बचाया है दीमक लगने से और आंधियो में भी उन्हें नही उड़ने दिया

एक एक पन्ने को प्यार से जोड़ा है .... एक किताब बना दी है उनकी

ऐसी किताब जो जिन हाथो में जायेगी ...तारीफ़ ही पाएगी

दुःख तो है ये की जिस ने इन पन्नो की किताब बनाई है .....उस का नाम तक नही है इस पे कही !!!

Monday, April 5, 2010

इज़हार-इ-इश्क..

ये कविता खास उन लोगो क लिए जो किसी से प्यार करते हैं और वो भी एकतरफा॥
या फिर वो जिससे प्यार करते हैं उन्होंने अपना इज़हार-इ-इश्क नहीं किया है॥

होंठो पे ना ,दिल में हाँ,
ये तो प्यार का दस्तूर है।
लाख छिपाया मगर आँखे कर गयी सच बयां,
तो इस में हमारा क्या कसूर है॥
एक वो हैं की जान कर भी अनजान बने हैं,
गुरूर है खुद पे या प्यार नहीं हमसे
जाने किस बात पे तने हैं॥
शायद गलती हमारी ही है,
जो बिन सोचे समझे प्यार किया
लायक नहीं हैं हम उनके,
जिन्हें ये दिल दिया॥
पर एहसास तो हमे भी हुआ था ,
की वो पसंद करते हैं हमे
ग़लतफहमी थी या वो सताना चाहते हैं हमे॥
ये कैसी कशमकश है,ये कैसा प्यार है,
कह दो अगर कुछ दिल में है।
हमे तो बस सुनने का इंतज़ार है॥

Tuesday, March 30, 2010

मेरे पापा

 कल अपने पापा से मेरी बात हो रही थी...अचानक ही कहने लगे बेटी तुम्हे देखे कितने दिन हो गये...गर्मी की छुट्टियाँ आते ही मायेके जाने की तयारी शुरू हो जाती है लेकिन इस बार शायद जाना ना हो पाए...पापा हमेशा कहते है बेटियों को जन्म दो, इतने प्यार से उन्हें पालो पोसो बड़ा करो और फिर एक दिन उन्हें देखने के लिए भी तरस जाओ...चिडियों सी चहचहाती पूरा घर गुलजार करती ये बेटियाँ एक दिन सब सूना कर परदेश चली जाती है...ये उनकी एक बड़ी शिकायत है इस समाज से...उनकी इन्ही सारी बातो को याद करते करते कल कुछ पंक्तियाँ लिख गयी....

पापा आज आपकी बहुत याद आ रही है...
वो पिछला गुजरा जमाना, वो मेरा बचपन सुहाना...
हमारा बारिश में भीगना, फिर माँ की डांट से बचाने के लिए आपका दुकान में छुपा लेना...
साथ बिठाकर खाना खिलाना, मेरे सारे गणित करवाना...
मेरे रिजल्ट आने पर खुद से ज्यादा खुश आपको देखा है मैंने...
दिवाली के पठाखे लाना, छट के घाट घुमाना...
होली में खुद ठंडाई बनाना और दशहरे में स्कूटर से पूरा शहर घुमाना...
जिंदगी जीना तो आपसे ही सीखा है मैंने...
तराने गुनगुना कर माँ को छेड़ना, फिर माँ का मुस्का कर पलट जवाब देना...
इस प्यारा भरे रिश्ते की छाँव में हम कब बड़े हो गये पता भी नहीं चला...
मुझे याद है जब मैंने पहली बार खाना बनाया था...
और आपने उस तेज़ नमक की दाल को भी कितने चाव से खाया था...
फेरो के समय घूँघट की आड़ से धीरे से देखा था मैंने आपको...
नम आँखे और हलकी मुस्कान लिए चुप-चाप बैठे थे आप...
अपनी रानी बिटिया किसी और को सौपते हुए आपका हाथ भी कांपा था...
याद है मुझे कितना रोये थे आप कलेजे से लगा अपनी बेटी को...
जीवन की सफलता असफलता का ज्यादा ज्ञान नहीं मुझे...
लेकिन आपकी बेटी बनकर जन्म लेना ही मेरा जीवन की सार्थकता है...

Saturday, March 20, 2010

अनजाना रिश्ता..


कुछ तो रिश्ता है उनसे जो ये दिल उन्हें अपना मानता है ,
क्या है,क्यों है,इसका जवाब तो बस रब्ब ही जानता है.
हर घडी जेहेन में बस ख्याल है उनका,
देख ले झलक एक पल तो दिल को सुकून मिल जाता है।
न जाने कैसी कशिश है उनकी आवाज़ में,
वो बात न करे तो हमसे तो सारा जहाँ चुप-चाप सा नजर आता है॥

यकीन नहीं है खुद पे और अपनी किस्मत पे भी,
इसलिए उनके खफा होने का ख्याल दिल को रुलाता है।
अनजान हैं वो इन सब से ,कुछ नहीं जानते,
कि कोई अपनी आंखों में उन के सपने सजाता है॥

कहते हैं खोना-पाना दुनिया का दस्तूर है,
पाना नहीं चाहते उन्हें हम,फिर खोने से दिल डरता है।
यूं ही हँसते मुस्कुराते रहे वो ज़िन्दगी भर,
उनके हिस्से के आंसू भी मुझे मिले,बस येही फरियाद अब दिल करता है॥
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