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Wednesday, February 1, 2012

गजल 4


रात भर जागा हूँ मैं , मुझे सुबह का उलहाना मत दो
बड़ी मुश्किल से सीखा है खुश रहना ,
फिर से मुझे आंसुओं वाला जमाना मत दो

तनहा होता हूँ घबराता हूँ , मैं ही जानता हूँ ,कैसे अकेले रह पाता हूँ
अब तुम ऊपर से, मुझे विराना मत दो
रात भर जागा हूँ मैं , मुझे सुबह का उलहाना मत दो |

आँखों से नमी दूर होने का नाम नहीं लेती ,
मेरे चेहरे की मुस्कान , कोई शाम नहीं लेती
अब फिर मुझे मौसम सुहाना मत दो
रात भर जागा हूँ मैं , मुझे सुबह का उलहाना मत दो |

जिसने चाहा तब लूटा , मै बिखर बिखर के फिर टूटा
मुझे नया कोई फ़साना मत दो ..|

माना मेरे चेहरे पर दिखती है तुम्हे कहानियां कई
पर खुदा के लिए, फिर मुझे नाम दीवाना मत दो
रात भर जागा हूँ मैं , मुझे सुबह का उलहाना मत दो |

1 comment:

sushma 'आहुति' said...

बहुत ही खूबसूरती स वयक्त किया है मन के भावो को.......

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