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Friday, January 6, 2012

तीसरी गजल



ना शराब से है ना शबाब से है ,
मुझे मोहब्बत सिर्फ कलम किताब से है ||
तुझे मेरी जिन्दगी के खाते में, कोई गड़बड़ी नहीं मिलेगी ,
मैंने जी जिन्दगी, बड़े हिसाब से है ||

वो जिनकी आँखों को चुभती है, हँसी मेरी
वो सब कहतें है , हम बड़े खराब से है |
पर मै जो हूँ , वही दिखाता हूँ दुनियां को
मुझे सख्त नफरत, चेहरे पर नकाब से है ||

हम उठते है लेट , सोतें है लेट
हर काम भी हम करते है लेट |
हम अपने आप में थोड़े नवाब से है...||

वो सवाल उठा कर दुबक गया अपने बिल में
लोग कहतें है उसको डर मेरे जवाब से है |
पर हम सच को कहतें है सच , और गलत को कहतें है गलत
इसलिए उन्हें लगता है, हम बड़े बेहिसाब से है |
ना शराब से है ना शबाब से है ,
मुझे मोहब्बत सिर्फ कलम किताब से है ||

4 comments:

नीरज गोस्वामी said...

एक बार फिर आपकी कलम ने अपना लोहा मनवाया है...कमाल की रचना...बधाई...

नीरज

Aditya said...

बहुत ख़ूब सर..

समय मिले तो मेरे ब्लॉग पर भी पधारने की कृपा किजियेगा..
http://palchhin-aditya.blogspot.com/

sushma 'आहुति' said...

बहुत खुबसूरत रचना अभिवयक्ति.........

सागर said...

behtreen rachna..........

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