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Tuesday, May 11, 2010

mera gaanv mera sahar


मेरे गाँव में घर की छत पे आज भी मोर आते है
मेरे शहर में मुझे चिडिया भी देखने नही मिलती ॥

मेरे गाँव में लोगो के बीच आज भी वो ही भाईचारा है
मेरे शहर में भाई की भाई से ही नही बनती ॥

मेरे गाँव में सुख दुःख में सब साथ है
मेरे शहर में परछाई भी साथ नही दिखती ॥

मेरे गाँव में आज भी पक्की सड़क नही है
मेरे शहर में सड़के है पर मंजिल नही मिलती ॥

मेरे गाँव में आज भी सब नीम के पेड़ तले बतियाते है
मेरे शहर में लोगो को फ़ोन से फुर्सत नही मिलती ॥

मेरे गाँव में बच्चे आज भी माँ के आँचल में पलते है
मेरे शहर में अब माँ का आँचल ही देखने को नही मिलते है ॥

मेरे गाँव में सावन में आज भी झूले पड़ते है
मेरे शाहर में पार्क में भी झूले देखने को नही मिलते ॥

मेरे गाँव में आज भी हर तीज त्यौहार के लिए अपने गीत है
मेरे शहर में बद से बदतर होता कान फोडू संगीत है ॥

मेरे गाँव में कुछ नही है फिर भी लोग खुश है
मेरे शहर में सब कुछ है ..फिर भी चेहरे पे वो खुशी नही दिखती ॥

मेरे गाँव में अमन है सुख है चैन है
मेरे शहर में हर मुस्कराहट के पीछे भीगे हुए नैन है ॥

11 comments:

arvind said...

gaon our shahar me yahi fark hai.....per kya kare ab to gaon ka aise hi shaharikaran kiyaa ja rahaa hai....sundar rachna.

देवेश प्रताप said...

गांव तो गांव है ......और उसका आनंद ही कुछ और होता है .

Shekhar Suman said...

bilkul sahi kaha aapne.....
gaon mein jo baat hai shehar mein kahan??
bahut hi sundar wichaar....
yun hi likhte rahein...
-----------------------------------
mere blog mein is baar...
जाने क्यूँ उदास है मन....
jaroora aayein
regards
http://i555.blogspot.com/

संजय भास्कर said...

bilkul sahi kaha aapne.....

संजय भास्कर said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति संवेदनशील हृदयस्पर्शी मन के भावों को बहुत गहराई से लिखा है

Amarjeet said...

aapki rachna ko padh kar ghar ki yad aa gayi

राकेश कौशिक said...

गाँव और शहर के फर्क को शब्द देने की अच्छी कोशिश लेकिन आजकल गाँव में भी वो बात कहाँ?

दीपक 'मशाल' said...

गाँव याद दिला दिया आपने.. बढ़िया रचना मज़ा आया.. आभार

EKTA said...

jab gaon me sab kuchh hai to log sheher ki taraf kyu aakarshit hote hain??

संजय भास्कर said...

GOAN KI YAAD AA GAI KAVIT APADH KAR......

ashish said...

Sach me achchhi kavita hai......
Khas kar ye line - "Mere gav me bchche aaj bhi maa ke anchal me palate hai,Mere shahar me ab maa ka anchal hi dekhne ko nahi milte hai." aap ne to shahar ka kadva shty bayan kiya hai......

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