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Sunday, May 23, 2010

पड़ाव


उम्र का एक और पड़ाव आज पार कर चुके है
किसी हमसफ़र के इंतज़ार मे हम अब रुके है ॥
जिन्दगी का आधा सफ़र तय कर लिया सा लगता है
क्या पाया क्या खोया इसका हिसाब भी चहरे पे साफ़ दिखता है
हमने अपने आप को नोट छापने की मशीन नहीं बनाया
जहाँ तक हो सका किसी का दिल नहीं दुखाया ॥
बुरा लोगता है जब लोग कहते है तुमने किया क्या है
अब कागज़ के नोटों मे विश्वास रखने वालो को
किसी के चहरे पे आई मुस्कान का मोल कैसे बताये ?
किसी के गम बाँट लेने से, मिला सुकून को कैसे समझाए ?
खेर अब लोगो की परवाह करता भी कोंन है ?
अब तो बोलने वालो से ज्यादा डर उनसे लगता है जो मोन(चुप ) है
मुझ से बस कभी किसी का दिल न टूटे ॥ कोई अपना मुझ से कभी न रूठे
मुझे कभी कृत्रिम चीजों से लगाव न हो और अपनों के मन मे मेरे लिए कड़वाहट न हो ॥
गम छिपा के लोगो को हँसाते रहे .... ख़ुशी के नगमे हर दिन गाते रहे ॥
आँसू को पलकों तले दबा के मुस्कराते रहे और इसी तरह जिन्दगी बिताते रहे
जिन्दगी के हर मोड़ पे हमे आप का साथ चाहिए
फिर एक नयी शाम इंतज़ार कर रही है ॥ आप आइये साथ निभाइए ॥

5 comments:

Shekhar Suman said...

waah zindagi ke khubsurat mod par ek khubsurat si kavita....
maan gaye vijay ji.....
achhi rachna hai....
yun hi likhte rahein...
mere blog par bhi aapka intzaar rahega........

arpit said...

bahut khubsurat rachna , bahut sunder likhte he aaap , aapki saari rachnaye padhkar anand aa gayi , visheshkar maa par likhi rachna shresht he

http://bejubankalam.blogspot.com/

Tripat "Prerna" said...

bahut khoob..jaise apna astitv khol kar rakh dia hoa aapne

http://liberalflorence.blogspot.com/
http://sparkledaroma.blogspot.com/

Rahul said...

Very good ..sorry couldnt find ur name in blog!!!Keep writing!!

राकेश कौशिक said...

साफ़ और निर्मल मन को दर्शाती दर्पण की तरह सच्ची रचना - क्योंकि आपकी चाहत में कोई खोट नहीं है इसलिए अवश्य पूरी होगी - मेरा विश्वास और ईश्वर से विनती है कि आपके इन अहसासों और सोच पर कभी आंच न आये

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