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Friday, January 6, 2012

तीसरी गजल



ना शराब से है ना शबाब से है ,
मुझे मोहब्बत सिर्फ कलम किताब से है ||
तुझे मेरी जिन्दगी के खाते में, कोई गड़बड़ी नहीं मिलेगी ,
मैंने जी जिन्दगी, बड़े हिसाब से है ||

वो जिनकी आँखों को चुभती है, हँसी मेरी
वो सब कहतें है , हम बड़े खराब से है |
पर मै जो हूँ , वही दिखाता हूँ दुनियां को
मुझे सख्त नफरत, चेहरे पर नकाब से है ||

हम उठते है लेट , सोतें है लेट
हर काम भी हम करते है लेट |
हम अपने आप में थोड़े नवाब से है...||

वो सवाल उठा कर दुबक गया अपने बिल में
लोग कहतें है उसको डर मेरे जवाब से है |
पर हम सच को कहतें है सच , और गलत को कहतें है गलत
इसलिए उन्हें लगता है, हम बड़े बेहिसाब से है |
ना शराब से है ना शबाब से है ,
मुझे मोहब्बत सिर्फ कलम किताब से है ||

Monday, December 26, 2011

वो अपनी उम्र से कुछ ज्यादा, बड़ी सी लगती है ||


वो अपनी उम्र से कुछ ज्यादा, बड़ी सी लगती है
उसके जीवन में खुशियों की, कमी सी लगती है |
मुस्कराती है ज़माने को, दिखाने के खातिर
अन्दर उसके , आसुओं की झड़ी सी लगती है
वो अपनी उम्र से कुछ ज्यादा, बड़ी सी लगती है ||

उसका बचपना छूट गया, जवानी की दहलीज पे
ज्यादा दिन टिक ना सका, यौवन का खुमार..|
कभी खुद लापरवाह , कभी रिश्ते बेपरवाह
जिन्दगी अब उसकी, मज़बूरी सी लगती है ..|
वो अपनी उम्र से कुछ ज्यादा, बड़ी सी लगती है ||

किसी की नफरत ने , उसे बड़ा बना दिया |
किसी की फितरत ने, उसे बड़ा बना दिया |
आसुओं को पीती रही , गमों को सीती रही
अपने दर्द को उसने , हमेशा हँसी में उड़ा दिया |

वक्त बेवक्त भीगी पलकें ,अश्कों को उसकी, मंजूरी सी लगती है
वो अपनी उम्र से कुछ ज्यादा , बड़ी सी लगती है ||

Tuesday, December 20, 2011

वक्त आ गया है ... हैप्पी विंटर


वक्त आ गया है ...
उस महरूनी स्वेटर, को फिर से बनाने का
मुन्ना को सर्दी से बचाने का ||
वो दो - बटा चार के फंदे, सलाइयों में डालने का
पुरानी पड़ी ऊन, को सँभालने का ||

वक्त आ गया है ...
वो उसका ऊन के गोले को , मुझ से दूर ले जाना
उसको समेटते, समेटते , उसका मुझमे समा जाना ||
ऊन में पड़ चुकी , उलझनों को सुलझाने का
मासूमियत से रिश्ते निभाने का ,
फिर वक्त आ गया है ...;) वक्त आ गया है ...;) ||

रिश्तों में गर्माहट लाने का , मीठी धुप को कतरें कतरें तक पहुँचाने का
तिल , रेवड़ी , गजक , गर्म गाजर का हलवा खाने का
वक्त आ गया है ...;) ||

अब आप भी ग़मों को खोल कर , छत पर सुखा दो
अपनी खुशियों को थोड़ी हवा लगा दो
वक्त आ गया है सीलन को मिटाने का , दुखों को अलाव में जलाने का
जीवन से कड़वाहट मिटने का , अपनों को करीब लाने का
वक्त आ गया है ...;) ||वक्त आ गया है ...;) ||

happy winters ||

मैंने देखा इस साल में .....2011



मैंने देखा इस साल में .....
नेताओं को तिहाड़ जेल में आराम फरमाते , आतंकवादी को राजकीय अतिथि सा सम्मान पाते
मैंने वर्ल्ड कप को अपने हाथ में देखा , पूरे देश को अन्ना के साथ में देखा |
मैंने किंगफिशर का नशा उतरते देखा , सोने को तेजी से चढ़ता देखा |
मैंने खून से सनी मुंबई देखी ... देखी, खून से सनी दिल्ली
आम जन मरतें रहें ... और नेता ...बैठे रहें बन के भीगी बिल्ली ||

मैंने देखा इस साल में ...
गरीब के साथ साथ , मिडल क्लास को भी रोते हुए ... सरकार को कान में रुई डाल के सोते हुए |
मैंने महंगाई की मार देखी .... मैंने भूख से हाहाकार देखी |
मैंने संसद में सिर्फ हंगामा और बहस देखी , मैंने किसान की जमीं पर कार रेस देखी |
मैंने रामलीला में लोकतंत्र को पिटते देखा ... नारी की इज्जत को सरे आम लुटते देखा |
राजनेताओं को लगा "भंवरी" का रोग देखा ... "सीबीआई" का बेजा दुरूपयोग देखा ||
मैंने "ममता" को मिलते राज देखा .... "सुशिल कुमार" को पहने ताज देखा |
मैंने देखी हत्या पत्रकार की ... सूरत देखी घोटालों वाली सरकार की |

मैंने देखा इस साल में ....
मेरे "अपनों" को हमेशा के लिए जुदा होते हुए ....उनकी याद में हर एक को रोते हुए :(
मैंने देखा हर दिल अजीज शम्मी कपूर को जातें हुए .... उस जवान आदमी(देवानंद ) को भी लोगो को रुलाते हुए |
मैंने रुआंसी गजल(जगजीत सिंह ) देखी ...... नविन (नविन निश्चल) के लियें आँखें सजल देखी |
दो उस्तादों को आखरी सलाम देखा | (भूपेन हजारिका / उस्ताद सुल्तान खां )
प्रधानमंत्री की होड़ में , सब से उपर मोदी का नाम देखा |

इस साल मैंने जिन्दगी का हर उतार चड़ाव देखा , हर महीने पेट्रोल का एक नया भाव देखा ||
मैंने जनता का लोकतंत्र के गाल पर तमाचा देखा..उन्नति का, "खाली कागजों" में सरकारी खांचा देखा |
अब बस गुजारिश ऊपर वाले से इतनी, की या तो , इस राजनीती को वो खुद संभालें |
या फिर हम को भी अब अपने पास बुलाले | :)
इस महंगाई में , भ्रष्ट तंत्र में अपना दम घुटता है ...
बच्चों की छोटी फरमाइश के आगे भी , अब अपना सर झुकता है |
इस साल महंगाई ने , अपनी कमर भी तोड़ डाली है ,
कैसे मनाऊं जश्न नये साल का , मेरी दोनों जेबें खाली है :(

Tuesday, November 29, 2011

बैठ जाइए बैठ जाइए (आम आदमी पार्ट २)


बैठ जाइए बैठ जाइए बैठ जाइए
इस देश को हम कभी, खड़ा होने नहीं देंगे
जिन्दा लाश बना देंगे, आम जन को
किसी को कब्र में भी चैन से सोने नहीं देंगे |
बैठ जाइए बैठ जाइए बैठ जाइए ||

आप बैठते है तो ,पेट्रोल ऊँचा चड़ता है
आरक्षण का आक्रोश बड़ता है
सरकारी गोदामों में अनाज सड़ता है
भूख से बिलख के आम आदमी मरता है |
यहाँ बैठने वालों से,हर आदमी डरता है |
गांधी भी इस खादी से, दहशत में आहें भरता है ||
बैठ जाइए बैठ जाइए बैठ जाइए ...

जनता की आह को, हम यहाँ ,शौर में दबा देंगे
उनकी खून पसीने की कमाई को , हगामें की भेट चड़ा देंगे |
और फिर भी जागी रही जनता, तो उन्हें आपस में लड़ा देंगे
झूठे केस बना बना उन्हें ताउम्र, जेल में सडा देंगे |
बैठ जाइए बैठ जाइए बैठ जाइए ...

यहाँ के लोकतंत्र में ,जनता का अब भी विश्वास है
चाहें हम लोगो के मन में, सिर्फ विष का ही वास है
बैठ जाइए बैठ जाइए बैठ जाइए
इस देश को लूटने के लिए,समय सब को दिया जाएगा
अरबों के घोटालों का हिसाब भी. नहीं लिया जाएगा |
यह लोकतंत्र , "लोक" के लिए नहीं, नोट के लिए बना है
बैठ जाइए यहाँ जनता की हित की बात करना, सख्त मना है |

Wednesday, November 23, 2011

दूसरी गजल


उम्मीदों की सड़क नहीं मिलती , खुशियों का आसमां नहीं मिलता
यहाँ किसी को अपने , सपनों का जहां नहीं मिलता ?
तुम कहते हो, क्यूँ मरे जा रहें हो ?
प्यारे इस महंगाई में, जिन्दा रहने का, "सस्ता" सामान नहीं मिलता |

उसने भेजा था धरती पर , तब में सिर्फ इंसान था
अब मजहबों में बांटा दिया गया ,
उसकी धरती पर हर लाश को , शमशान नहीं मिलता |

देर तक जिन्दा रहते है अक्सर वो , जिनकी मौत का इंतजार होता है सब को
और जिस का इंतजार होता है घर पर रात भर ,सुबह तक वो इंसान नहीं मिलता |

कहतें है आदमी की जान का दुश्मन, खुद आदमी है यहाँ
पर किसी शख्स के चेहरे पर, खतरे का निशान नहीं मिलता ?

गम मुकम्मल मिलतें है , दर्द मुकम्मल मिलतें है
बस मुक्कमल ईमान नहीं मिलता |

मैं लिख देता हूँ चाँद , तारें, किसी की भी जिन्दगी में
पर मुझे दो वक्त की रोटी का, इनाम नहीं मिलता ||

उम्मीदों की सड़क नहीं मिलती , खुशियों का आसमां नहीं मिलता
यहाँ किसी को अपने , सपनों का जहां नहीं मिलता

गजल ..


तुम हमें क्या रुलाओगे , ?
आंसू हमारी और आते आते , खुद ही मुस्कराने लगतें है |

हम चाँद को छेड़ देतें है , सूरज के सायें में
तुमको अब भी , हम सयाने लगतें है ?

दर्द की बात मत करना, ना ही जख्म देना हसीं कोई
जब गम होतें है ज्यादा दिल में , हम लोगो को हँसाने लगते है |

मुझे याद करना हर पल , मैं हिचकियो से घबराता नहीं
पर मुझे याद ना आना , हमें भूलने में ज़माने लगतें है |

मेरी तस्वीर देख कर , अपना इरादा बदल ना लेना
हम सूरत से , कुछ पागल दीवाने लगतें है |

तुम फूल हो, तो हमे fool बनाने की, गुस्ताखी ना करना
हम मूडी है , जब मन किया, खुद को ही सताने लगते है |

तुम बाग़ में रहों या घने जंगल में , परवाह किसे है ?
जब मन भर जाएँ फूलों से , हम काटों से रिश्तें बनाने लगते है |

तुम हमें क्या रुलाओगे , ?
आंसू हमारी और आते आते , खुद ही मुस्कराने लगतें है
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