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Wednesday, September 7, 2011

आज मेरा गम, तेरे गम सा क्यूँ है


आज मेरा गम, तेरे गम सा क्यूँ है ?
हम सब सुरक्षित है, यह वहम सा क्यूँ है ?
जख्म बन चुका है नासूर
पर वो ही पुराना मरहम सा क्यूँ है ?

बेकसूरों को मुआवजा , जान कि कीमत ?
और खुनी को बिरयानी , दामाद सी आवभगत
इस देश में ऐसा, नियम सा क्यूँ है ?
आज मेरा गम, तेरे गम सा क्यूँ है ?

गांधी भी चुप हैं , और भगतसिंह भी मौन है
सब जानते है पता कातिल का ....
पर सब "बन" के पूछ रहें है, कि अपराधी कौन है ?
आँख बंद करने से मौत टल जायेगी, तुझे ऐसा भ्रम सा क्यूँ है ?
आज मेरा गम, तेरे गम सा क्यूँ है ?

इन सफेदपोशों को, आईना भी, चेहरा कैसे दिखा देता है ?
बेशर्मी इतनी लहू में इनकें , लाशों पे राजनीति करना सीखा देता है ||
मारें तुने बेगुनाह हजारों , कभी कोर्ट में कभी फोर्ट में , कभी रोड पे कभी मोड़ पे
पर यह तो बता , इन सफेदपोश गद्दारों पे तेरा रहम सा क्यूँ है ?
आज मेरा गम, तेरे गम सा क्यूँ है ?
हम सब सुरक्षित है, यह वहम सा क्यूँ है ?

Tuesday, August 23, 2011

करवटों के सहारे...



करवटों के सहारे.. हर रात बीती है
तन्हाई में मेरी, सुबह जीती है ...
वो चैन से सोता है , मुंह उधर कर
रोजाना मेरी आँखे , मेरे अश्क पिती है ||
करवटों के सहारे.. हर रात बीती है ...

ये किस मोड़ पर मेरा जीवन ,
कि मेरा अपना कुछ ना रहा ...|
ना आँखों में सपने रहे , ना सपनों का राजा,
अब मैं भी ना रहूँ ....?
क्या यही है वक्त का तकाजा ?

हर रोज उधेड़ जाता है, वों जख्म मेरे ...
जिन्हें कितनी मुश्किल से, काली रातें सीती है
करवटों के सहारे.. हर रात बीती है ||

चारों और इतना अँधेरा क्यूँ है ?
मेरा गम इतना गहरा क्यूँ है ?
जिसमें बसती थी, रूह मेरी
वों बिन मेरे भी , पूरा क्यूँ है ?

ना जानें भाग्य कि कैसी "नीयती है
सब कुछ पा कर भी , जिन्दगी रिती है
करवटों के सहारे.. हर रात बीती है ||

Wednesday, August 10, 2011

बंद झरोखे से "सपनें"


कुछ "सपनें" भी बंद झरोखे से है ....
जिनकें कपाटों को गर खोल दिया तो
तूफ़ान सा आ जाएगा ||
"ताश के पत्तों सा जीवन"
बिखर जाएगा ...
पर आंधी के डर से
कब तक बंद रखा जा सकता है
दरवाजों को ?
"धुप" का इंतज़ार भी तो है
"सीली" हुई सी "दीवारों" को ...
और अँधेरे के खात्मे के लिए
कुछ "रौशनी" भी तो चाहियें ||
और कुछ "ताज़ी हवा" कि भी
दरकार है जीने के लिए ...||

Saturday, August 6, 2011

दोस्त हैप्पी फ्रेंडशिप डे

कभी हँसाता है, कभी रुलाता है ,
ये, वो रिश्ता है, जो जीना सिखाता है ||
कच्चे धागे में, अनमोल मोती सा ...
चाहे मीलों दूर ही सही, पर आँखों कि ज्योति सा ...
कभी सच्चा सा , कभी झूठा सा ...
कभी हमें मनाता, मिन्नतें कर के, कभी हमसे ही रूठा सा ...

मेरे अधूरे सपने वो अपनी पलकों पे सजाता है ...
अक्सर मेरी परछाई में, वो अपना अक्स दिखाता है,
ये वो रिश्ता है, जो जीना सिखाता है ||

कभी आभास सा , कभी अहसास सा
टेड़ा मेडा जलेबी कि तरह, पर शहद कि मिठास सा
उडती पतंग कि डोर सा , सुरीले संगीत के शौर सा ..

मेरे रुके कदम को वो अपने होसलों से चलाता है
मंदिर मस्जिद गुरुद्वारें जिसकी तलाश में हम घूमें ..
वो खुद, दोस्त बन के हमारी जिन्दगी में आता है
ये रिश्ता जीना सिखाता है

Wednesday, July 20, 2011

बारिश के बाद कि सुबह..


बारिश के बाद कि सुबह ,थोड़ी भीगी सी , थोड़ी अलसाई सी
हरें पेड़ों कि पत्तियां थोड़ी खिली सी, थोड़ी मुरझाई सी ...
थोड़ी नमी सी दीवारों में , थोड़ी बूँदें किनारों में
थोड़ी सी मस्ती इशारों में, उड़ते परिंदे नजारों में
सूरज कि बाहें खुली खुली , हर एक कली इठलाई सी
बारिश के बाद कि सुबह ,थोड़ी भीगी सी , थोड़ी अलसाई सी ||

जारी है , बादलों का सूरज के साथ,अठखेलियाँ करना
गीले आँगन में हमारा , संभल संभल के चलना ...
टूटी छतों कि मरम्मत का दौर , कहीं से बहते पानी का शोर ||
अभी तक वो छोटी गिलहरी , पानी से कुछ सकुचाई सी
बारिश के बाद कि सुबह ,थोड़ी भीगी सी , थोड़ी अलसाई सी ||

बारिश के बाद कि सुबह , ना जाने क्यूँ आसमान , कुछ ज्यादा ही नीला सा है
पत्तों, पेड़ों , दीवारों , धरती के साथ, मन भी तो थोडा गीला सा है ||
सीली- सीली हवा के झोंके, ख्वाबों में भी कुछ सीलन सी ले आयें है..
गीली हरी दूब के अहसास को , हम अपना दिल दे आयें है...
देखो फिर एक बार , प्रक्रति ने हमसे, दोस्ती निभाई सी ...
बारिश के बाद कि सुबह ,थोड़ी भीगी सी , थोड़ी अलसाई सी ||

Thursday, July 14, 2011

आ उड़ चले अब गगन में...


आ उड़ चले अब गगन में , धरती पे बहुत शौर है
हर एक शाम रंगी खून से , सिसकती हर एक भौर हैं
आ उड़ चले अब गगन में , धरती पे बहुत शौर है ||

जो सफेदी कभी देती थी शांति का सन्देश
उस को लपेटे खड़ा , कोई कातिल है कोई चोर है
आ उड़ चले अब गगन में , धरती पे बहुत शौर है ||

अँधेरा कर गयी पूरी जिन्दगी में, एक सुहानी शाम
गायब हुई मुस्कराहट लबों से , ना मिलें आसुओं को आराम
उतरा नहीं इक निवाला हलक से , हाथों में अधूरी रोटी कि कोर है
आ उड़ चले अब गगन में , धरती पे बहुत शौर है ||

इंसान ही इंसानियत का कर रहें है खून ...
हरी भरी धरती को लाल करने का कैसा है ये जूनून ?
सहमा - सहमा हर एक शख्स, किस काम का ये नया दौर है ?
आ उड़ चले अब गगन में , धरती पे बहुत शौर है ||
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कुछ दिन करेंगे हो हल्ला , फिर सब चुप हो जायेंगें
सचिन का होगा सौवां शतक , हम धमाकों का दर्द भूल जायेंगें
दिल्ली कहेगा मुंबई कि गलती , मुंबई कहेगा दिल्ली कि
इस देश में ऐसा होता रहेगा , ये लड़ाई है चूहे बिल्ली कि
ना जाने लाल किले के कानों को कोन सा धमाका हिलाएगा
कब तक इस प्यासी धरती को , आम आदमी का लहू दिया जाएगा ?
मुंबई आतंकवादी हमलें में मारे गए सभी आम आदमी को इस आम आदमी कि और से अश्रुपूर्ण श्रदांजलि ||

Thursday, July 7, 2011

हसीं ख्वाब /बेरंग जिन्दगी



मुझे चाँद में तू नजर नहीं आती आज कल
जब से उस गरीब को उसमें रोटी दिखाई दि है ||

मुझे फुहारों में तू नजर नहीं आती आज कल
जब से उस गरीब कि झोपडी, टूटी दिखाई दि है ||

तेरे इंतज़ार में लम्बी नहीं लगती रातें अब ...
जब से उसकी रातें , रोती दिखाई दि है ||

तेरे ख्वाब मेरी नींदे चुराते नहीं अब ..
जब से जिन्दगी फूटपाथ पे सोती दिखाई दि है ||

तेरा यौवन लुभाता नहीं मुझे अब
जब से उसकी फटी कुर्ती, छोटी दिखाई दि है ||

हसीं ख्वाब बेमानी लगने लगे है ...
जब से वो जिन्दगी खोती दिखाई दि है

मै ख्यालों में जी रहा था अब तक
जिन्दगी अब महसूस होती दिखाई दि है ||

मुझे चाँद में तू नजर नहीं आती आज कल
जब से उस गरीब को उसमें रोटी दिखाई दि है ||
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