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Sunday, November 17, 2013
Friday, September 20, 2013
डायरी का आज का पन्ना , "चाँद को न पाने की कसक"
पूनम का चाँद था छत पर
छूने को दौड़ पड़ा
पर भूल गया था की यह भी
सूरज की बिरादरी का है !
अब हाथ जला बैठा हूँ
और ये छाले, दिमाग की एक नस को
उम्र भर तननाए रखेंगे !
चाँद, खुबसूरत दूर से ही है
पास जाओगे गड्डों, में समा जाओगे
इतनी जिद मत करो उसे जानने की उसको पाने की
कहीं ऐसा न हो , तुम्हरा भविष्य चाँद से मरहूम रह जाये
छूने को दौड़ पड़ा
पर भूल गया था की यह भी
सूरज की बिरादरी का है !
अब हाथ जला बैठा हूँ
और ये छाले, दिमाग की एक नस को
उम्र भर तननाए रखेंगे !
चाँद, खुबसूरत दूर से ही है
पास जाओगे गड्डों, में समा जाओगे
इतनी जिद मत करो उसे जानने की उसको पाने की
कहीं ऐसा न हो , तुम्हरा भविष्य चाँद से मरहूम रह जाये
Wednesday, September 11, 2013
फिर तेरी कहानी याद आई
फिर कुछ गीत, पुराने निकलें है |
कागज , कलम , लफ्ज लिए हाथ में मैंने
हम फिर से , तुझ पर गजल बनाने निकलें है |
तेरी तस्वीर को यूँ ही नहीं छुपाया किताब में
तुझे ज़माने की नजरों, से बचाने निकलें है |
पीता नहीं हूँ, पर मयखाने का पता जानना है
क्यूंकि यारों की महफ़िल, सजाने निकलें है |
बन्दुक ली है , रखा सिन्दूर भी है हाथ में
जरुर कोई रस्म निभाने निकलें है |
तुम्हे याद करने के, बहाने निकले है
फिर कुछ गीत, पुराने निकलें है |
Friday, August 23, 2013
प्रसंग १.
शालिनी : विवेक ये देखो ये गेम मैंने जीत लिया।
विवेक : क्या ? ऐसे कैसे हो सकता है ! मैंने कितना खेल पर एक बार भी नहीं जीत पाया और तुम पहली बार में ही जीत गयी। ऐसा हो ही नहीं सकता जरुर चीटिंग की होगी।
शालिनी : नहीं विवेक सचमुच बिना किसी चीटिंग के मैंने ये खेला और जीती।
उठो शालिनी उठो.…
शालिनी : क्या हुआ विवेक तुम ठीक तो हो ?
विवेक : ये देखो मैंने तुमसे भी कम समय में खेला और जीत लिया। ऐसा कोई फील्ड नहीं जहाँ तुम मुझसे आगे निकल सको…
शालिनी : गुड नाईट विवेक।।
विवेक : क्या ? ऐसे कैसे हो सकता है ! मैंने कितना खेल पर एक बार भी नहीं जीत पाया और तुम पहली बार में ही जीत गयी। ऐसा हो ही नहीं सकता जरुर चीटिंग की होगी।
शालिनी : नहीं विवेक सचमुच बिना किसी चीटिंग के मैंने ये खेला और जीती।
(२-३ घंटे बाद रात करीब १ बजे. )
उठो शालिनी उठो.…
शालिनी : क्या हुआ विवेक तुम ठीक तो हो ?
विवेक : ये देखो मैंने तुमसे भी कम समय में खेला और जीत लिया। ऐसा कोई फील्ड नहीं जहाँ तुम मुझसे आगे निकल सको…
शालिनी : गुड नाईट विवेक।।
Monday, August 19, 2013
****
तिनके जोड़ा,
घर संजोया,
मोती पिरोया,
माला बनाई।
एक झोंका.....
माला टुटा,
मोती बिखरा ,
और हम अनाथ हो गये।
घर संजोया,
मोती पिरोया,
माला बनाई।
एक झोंका.....
माला टुटा,
मोती बिखरा ,
और हम अनाथ हो गये।
Friday, May 3, 2013
ओनी पोनी जिन्दगी ..
ये जिन्दगी ...
जो कभी कहानी तो कभी गजल रही है ..!
कभी मछली सी ...
हाथो में है , जीने के लिए मचल रही है !!
कभी गीली साबुन सी ..
पकड़ना चाहो तो भी फिसल रही है !
कभी थक कर बैठ रही , कभी ख़ुशी से उछल रही है
ये जिन्दगी जो हर पल बदल रही है ...
जितना जीया इसे, उतना हाथ से निकल रही है !
ओनी पोनी जिन्दगी ,
आधा इंच ख़ुशी और एक इंच गम के बीच चल रही है ..
गिर रही है संभल रही है !!
Saturday, April 20, 2013
दो शक्लों वाला बलात्कार...
ये दो शक्लों वाला बलात्कार मुझे पचता नहीं है
तुम्हारी राजधानी में हुआ बलात्कार अत्याचार है
और हमारे कस्बें में हुआ बलात्कार चंद रुपयों का व्यपार है ?
सिर्फ इसलिए की वहां मीडिया है, हाई प्रोफाइल लोग है |
लाखों मोमबत्तियां और करोडो "मेल" फेशन में आ जातें है ||
चार दिन सार देश आँसूं बहाता है
और फिर पांचवे दिन ipl का नाच दिखाता है !
हमारे अख़बारों में स्त्रियाँ रोज दम तोड़ती है
रोज चीथड़े चीथड़े होता है बचपन
पर किसी के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती ?
बड़ी "ढीट" व्यवस्था है, सिर्फ केमरे के सामने हिलती है !
अँधा पढ़ा लिखा समाज है , सिर्फ भीड़ का अनुसरण करता है :(
Monday, February 18, 2013
Sunday, January 13, 2013
खबर...

जब उसका जन्म हुआ
सब उसके आस पास थे ....
घेरे थे सब उसको चारों और से
सब उसके अंदर तक झांक लेना चाहते थे
उसके जर्रे जर्रे को.. पहचान लेना चाहते थे
किसी ने देख कर आह किया , किसी ने वाह किया
किसी ने एक दो और जोड़ कर उसे अफवाह किया ||
वो सुर्ख़ियों में रही कुछ दिन ...
दुनियां के आसुओं से उसकी जिन्दगी नम हुई ...
फिर कुछ दिन बीते , भीड़ उसके आस पास कम हुई ...
जख्म भरने कोई आगे नहीं आया, वो अपने में ही गुम हुई ..
सिर्फ पुराने पन्नों में ,उसकी जिन्दगी छुपी है ...
वो एक "खबर" थी जो अब दम तोड़ चुकी है :)
Saturday, January 5, 2013
सिर्फ इतना सा कर लो ..
सुनो जहमत करो, अपनी सोच को बदलने की जरा सी ...
आज उसका दर्द , जो तुम्हे, महसूस नहीं हो रहा ,
कल वो दर्द, तुम्हे भी हो सकता है
दर्द को बांधों मत किसी दायरे में ...|
कुछ देर के लिए आईपॉड के इअर फ़ोन को कानों से हटा कर,
सुन भी लिया करो ..
की कोई दर्द से करहा तो नहीं रहा सड़क किनारे ...?
तुम्हारी आँखें अनदेखा क्यूँ कर देती है ..?
सड़क किनारे सर्दी में ठिठुरते, नग्न आदमी को
धुप से बचने का काल चश्मा , इंसानियत पर क्यूँ लगा लेते हो ?
खून रिसता क्षत विक्षत शरीर जो दिखाई पड़े
भयभीत मत हो , मुहं पोछने का रुमाल रखा है न जेब में माँ ने?
बांध दो उसे ..खून का रंग तुम्हरा भी same 2 same है ।
मोबाइल रखते हो न हाथ में ,जिसे तुम छेड़ते रहते हो बात ही बात में?
KBC का नंबर भी SAVE होगा उसमे ?
उसमे 108/100 भी save कर के रखो ..
हादसे के वक्त अमिताभ से ज्यादा, एम्बुलेंस काम आती है ...
सिर्फ इतना सा कर लो ,
क्यूंकि मोमबत्तियों जलाने से देश रोशन होता यदि
तो आजादी के 65 वर्षों बाद भी हम अंधेरें में नहीं "जी" रहे होते |
आहुति देता है चाँद , तब जा कर रोशन सवेरा होता है
जलाना पड़ेगा खुद को भी और दिमाग की बत्ती को भी, मोमबत्ती की तरह :)
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