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Wednesday, November 23, 2011

दूसरी गजल


उम्मीदों की सड़क नहीं मिलती , खुशियों का आसमां नहीं मिलता
यहाँ किसी को अपने , सपनों का जहां नहीं मिलता ?
तुम कहते हो, क्यूँ मरे जा रहें हो ?
प्यारे इस महंगाई में, जिन्दा रहने का, "सस्ता" सामान नहीं मिलता |

उसने भेजा था धरती पर , तब में सिर्फ इंसान था
अब मजहबों में बांटा दिया गया ,
उसकी धरती पर हर लाश को , शमशान नहीं मिलता |

देर तक जिन्दा रहते है अक्सर वो , जिनकी मौत का इंतजार होता है सब को
और जिस का इंतजार होता है घर पर रात भर ,सुबह तक वो इंसान नहीं मिलता |

कहतें है आदमी की जान का दुश्मन, खुद आदमी है यहाँ
पर किसी शख्स के चेहरे पर, खतरे का निशान नहीं मिलता ?

गम मुकम्मल मिलतें है , दर्द मुकम्मल मिलतें है
बस मुक्कमल ईमान नहीं मिलता |

मैं लिख देता हूँ चाँद , तारें, किसी की भी जिन्दगी में
पर मुझे दो वक्त की रोटी का, इनाम नहीं मिलता ||

उम्मीदों की सड़क नहीं मिलती , खुशियों का आसमां नहीं मिलता
यहाँ किसी को अपने , सपनों का जहां नहीं मिलता

गजल ..


तुम हमें क्या रुलाओगे , ?
आंसू हमारी और आते आते , खुद ही मुस्कराने लगतें है |

हम चाँद को छेड़ देतें है , सूरज के सायें में
तुमको अब भी , हम सयाने लगतें है ?

दर्द की बात मत करना, ना ही जख्म देना हसीं कोई
जब गम होतें है ज्यादा दिल में , हम लोगो को हँसाने लगते है |

मुझे याद करना हर पल , मैं हिचकियो से घबराता नहीं
पर मुझे याद ना आना , हमें भूलने में ज़माने लगतें है |

मेरी तस्वीर देख कर , अपना इरादा बदल ना लेना
हम सूरत से , कुछ पागल दीवाने लगतें है |

तुम फूल हो, तो हमे fool बनाने की, गुस्ताखी ना करना
हम मूडी है , जब मन किया, खुद को ही सताने लगते है |

तुम बाग़ में रहों या घने जंगल में , परवाह किसे है ?
जब मन भर जाएँ फूलों से , हम काटों से रिश्तें बनाने लगते है |

तुम हमें क्या रुलाओगे , ?
आंसू हमारी और आते आते , खुद ही मुस्कराने लगतें है

Thursday, November 17, 2011

जरा समय निकाल कर आ ...


तेरे मेरे दरमयां कुछ बातें , अधूरी पड़ी है
जरा समय निकाल कर आ
थोड़े मेरे "लफ्ज" ले जा ,थोड़े अपने "गम" दे जा ||

बामुश्किल खुशियाँ जोड़ी है, तेरे इंतजार में
जरा समय निकाल कर आ
मुझे आंसू दे जा , अपनी खुशियाँ ले जा ||

कुछ त्यौहार अधूरे पड़े है , तेरे इंतजार में
जरा समय निकाल कर आ
अपने पीने की वजह ले जा , मुझे जीने की वजह दे जा ||

उन गलियों में , हमारे कुछ पुराने किस्से रखें है
कुछ इल्जाम तो ले लिए मैंने अपने सर
बाकी कुछ तेरे हिस्से रखें है |
जरा समय निकाल कर आ
अपना इनाम ले जा, मुझे और इल्जाम दे जा ||

पिछली बात का जख्म , अब भी हरा है
आँखों में, आसुंओं का ,समन्दर भरा है
उन जख्मों को कुरेदने के बहाने आ
अपन हक ले जा , मुझे और जख्म दे जा |

तेरे मेरे दरमयां कुछ बातें , अधूरी पड़ी है
जरा समय निकाल कर आ

Friday, November 11, 2011

दो चम्मच प्यार...




दो चम्मच प्यार चाहिए उसे
चाहे तो कॉफ़ी के , कप में मिला दो
या फिर ...
आज , चाय अपने हाथ से, बना के पिला दो...
उसकी थोड़ी सी मदद कर दो , आटा गुन्दने में आज
आज थोडा शायराना , कर लो अपना मिजाज
आज उसके खाने की, जम कर तारीफ़ कर दो
आज उसके चेहरे पे , दो चार हसीं शेर गड़ दो

आज दो पल फुरसत के निकाल के सिर्फ उसकी सुनो
आज उसके दामन से थोड़े गम चुनों |

आज अहसास कराओ, उसे उसकी अहमियत
आज पूरी , उसकी ये छोटी सी हसरत कर दो |
उसके जीवन का एक पल , खुशनुमा अहसास से भर दो ॥

ना उसे आप का बैंक बैलेंस चाहिए , और ना ही आप की जिन्दगी
उसे चाहिए सिर्फ और सिर्फ "दो चम्मच" ज्यादा प्यार ...|

Thursday, October 27, 2011

दिल जली दिवाली


वो दोस्तों के साथ मनाता रहा जश्न सारी रात ,
मैं करवट बदल के रात बिताती रही
उसे पसंद था अँधेरा.... ताउम्र " विजय " ,
मैं एवई दीप जलाती रही ||

वो बांटता रहा खुशियाँ, गेरों के साथ दिवाली की
मैं खुद से ही, दिल को मनाती रही ||
वो करता रहा रोशन, गैरों के दीये
मैं यहाँ अकेले , अपना दिल जलाती रही ||
होगी लोगों के लिए खास, यह अमावस की रात
मैं तो हर रात, अमावस मैं बिताती रही ||

जिसें दिया था हक़,सात जन्मों का मैंने
वो एक दिन के लिए भी, मेरा हो ना सका |
वो लुभाता रहा, किसी और को अपने प्यार से
मैं शादी की तस्वीरों से, खुद को लुभाती रही ||

मेरे दिल का दीया बुझ गया
तेरे प्यार की कमी से , कब का |
मै सिर्फ रस्म निभाने के लिए
त्यौहार बनाती रही ||
उसे पसंद था अँधेरा.... ताउम्र " विजय " ,
मैं एवई दीप जलाती रही ||

Thursday, October 20, 2011

माँ मज़बूरी


माँ की दवाई का खर्चा, उसे मज़बूरी लगता है
उसे सिगरेट का धुंआ, जरुरी लगता है ||

फिजूल में रबड़ता , दोस्तों के साथ इधर-उधर
बगल के कमरे में, माँ से मिलना , मीलों की दुरी लगता है ||
वो घंटों लगा रहता है, फेसबुक पे अजनबियों से बतियाने में
अब माँ का हाल जानना, उसे चोरी लगता है ||

खून की कमी से रोज मरती, बेबस लाचार माँ
वो दोस्तों के लिए, शराब की बोतल, पूरी रखता है ||
वो बड़ी कार में घूमता है , लोग उसे रहीस कहते है
पर बड़े मकान में , माँ के लिए जगह थोड़ी रखता है ||

माँ के चरण देखे , एक अरसा बीता उसका ...
अब उसे बीवी का दर, श्रद्धा सबुरी लगता है ||
माँ की दवाई का खर्चा, उसे मज़बूरी लगता है
उसे सिगरेट का धुंआ, जरुरी लगता है ||

Sunday, October 16, 2011

मै तेरे शहर में नया हूँ ...|

मै तेरे शहर में नया हूँ
इसकी आबो हवा में, मुझे घुल जाने दे
मैं खुद से, खुद का, पता जानने निकला हूँ
मुझे किस्मत को आजमाने दे ||

सुना है अलग है तेरा, शहर मेरे शहर से
पर चाँद और सूरज का ठिकाना तो वोही है ?
लोग होंगे पराये , परवाह किसे है ?
मुझे चाँद सूरज से ही, रिश्ते निभाने दे ||

मै तेरे शहर में नया हूँ
इसकी आबो हवा में, मुझे घुल जाने दे ||

बड़े तहजीब का शहर है तेरा
यहाँ "सर" कह कर लोग, घर में घर कर लेते है
मुझे भी सर छुपाने के लिए, इक सर बनाने दे ||

मै तेरे शहर में नया हूँ ..
इसकी आबो हवा में, मुझे घुल जाने दे ||

तेरे शहर के लोग बड़े अजीब है...
अपनों से दूर है , अजनबियों के करीब है॥||

यहाँ तारुफ़ करने का, तकल्लुफ कोई नहीं करता...|
क़ानून को हाथ में लेने से भी कोई नहीं डरता |
क्यूंकि जिस की जेब मैं जितना पैसा, उतना वो शरीफ है |
गरीबी का जुर्म माथे पे मेरे भी, अबकी मुझे भी शराफत कमाने दे ||

मै तेरे शहर में नया हूँ
इसकी आबो हवा में, मुझे घुल जाने दे
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