Followers

Thursday, November 17, 2011

जरा समय निकाल कर आ ...


तेरे मेरे दरमयां कुछ बातें , अधूरी पड़ी है
जरा समय निकाल कर आ
थोड़े मेरे "लफ्ज" ले जा ,थोड़े अपने "गम" दे जा ||

बामुश्किल खुशियाँ जोड़ी है, तेरे इंतजार में
जरा समय निकाल कर आ
मुझे आंसू दे जा , अपनी खुशियाँ ले जा ||

कुछ त्यौहार अधूरे पड़े है , तेरे इंतजार में
जरा समय निकाल कर आ
अपने पीने की वजह ले जा , मुझे जीने की वजह दे जा ||

उन गलियों में , हमारे कुछ पुराने किस्से रखें है
कुछ इल्जाम तो ले लिए मैंने अपने सर
बाकी कुछ तेरे हिस्से रखें है |
जरा समय निकाल कर आ
अपना इनाम ले जा, मुझे और इल्जाम दे जा ||

पिछली बात का जख्म , अब भी हरा है
आँखों में, आसुंओं का ,समन्दर भरा है
उन जख्मों को कुरेदने के बहाने आ
अपन हक ले जा , मुझे और जख्म दे जा |

तेरे मेरे दरमयां कुछ बातें , अधूरी पड़ी है
जरा समय निकाल कर आ

Friday, November 11, 2011

दो चम्मच प्यार...




दो चम्मच प्यार चाहिए उसे
चाहे तो कॉफ़ी के , कप में मिला दो
या फिर ...
आज , चाय अपने हाथ से, बना के पिला दो...
उसकी थोड़ी सी मदद कर दो , आटा गुन्दने में आज
आज थोडा शायराना , कर लो अपना मिजाज
आज उसके खाने की, जम कर तारीफ़ कर दो
आज उसके चेहरे पे , दो चार हसीं शेर गड़ दो

आज दो पल फुरसत के निकाल के सिर्फ उसकी सुनो
आज उसके दामन से थोड़े गम चुनों |

आज अहसास कराओ, उसे उसकी अहमियत
आज पूरी , उसकी ये छोटी सी हसरत कर दो |
उसके जीवन का एक पल , खुशनुमा अहसास से भर दो ॥

ना उसे आप का बैंक बैलेंस चाहिए , और ना ही आप की जिन्दगी
उसे चाहिए सिर्फ और सिर्फ "दो चम्मच" ज्यादा प्यार ...|

Thursday, October 27, 2011

दिल जली दिवाली


वो दोस्तों के साथ मनाता रहा जश्न सारी रात ,
मैं करवट बदल के रात बिताती रही
उसे पसंद था अँधेरा.... ताउम्र " विजय " ,
मैं एवई दीप जलाती रही ||

वो बांटता रहा खुशियाँ, गेरों के साथ दिवाली की
मैं खुद से ही, दिल को मनाती रही ||
वो करता रहा रोशन, गैरों के दीये
मैं यहाँ अकेले , अपना दिल जलाती रही ||
होगी लोगों के लिए खास, यह अमावस की रात
मैं तो हर रात, अमावस मैं बिताती रही ||

जिसें दिया था हक़,सात जन्मों का मैंने
वो एक दिन के लिए भी, मेरा हो ना सका |
वो लुभाता रहा, किसी और को अपने प्यार से
मैं शादी की तस्वीरों से, खुद को लुभाती रही ||

मेरे दिल का दीया बुझ गया
तेरे प्यार की कमी से , कब का |
मै सिर्फ रस्म निभाने के लिए
त्यौहार बनाती रही ||
उसे पसंद था अँधेरा.... ताउम्र " विजय " ,
मैं एवई दीप जलाती रही ||

Thursday, October 20, 2011

माँ मज़बूरी


माँ की दवाई का खर्चा, उसे मज़बूरी लगता है
उसे सिगरेट का धुंआ, जरुरी लगता है ||

फिजूल में रबड़ता , दोस्तों के साथ इधर-उधर
बगल के कमरे में, माँ से मिलना , मीलों की दुरी लगता है ||
वो घंटों लगा रहता है, फेसबुक पे अजनबियों से बतियाने में
अब माँ का हाल जानना, उसे चोरी लगता है ||

खून की कमी से रोज मरती, बेबस लाचार माँ
वो दोस्तों के लिए, शराब की बोतल, पूरी रखता है ||
वो बड़ी कार में घूमता है , लोग उसे रहीस कहते है
पर बड़े मकान में , माँ के लिए जगह थोड़ी रखता है ||

माँ के चरण देखे , एक अरसा बीता उसका ...
अब उसे बीवी का दर, श्रद्धा सबुरी लगता है ||
माँ की दवाई का खर्चा, उसे मज़बूरी लगता है
उसे सिगरेट का धुंआ, जरुरी लगता है ||

Sunday, October 16, 2011

मै तेरे शहर में नया हूँ ...|

मै तेरे शहर में नया हूँ
इसकी आबो हवा में, मुझे घुल जाने दे
मैं खुद से, खुद का, पता जानने निकला हूँ
मुझे किस्मत को आजमाने दे ||

सुना है अलग है तेरा, शहर मेरे शहर से
पर चाँद और सूरज का ठिकाना तो वोही है ?
लोग होंगे पराये , परवाह किसे है ?
मुझे चाँद सूरज से ही, रिश्ते निभाने दे ||

मै तेरे शहर में नया हूँ
इसकी आबो हवा में, मुझे घुल जाने दे ||

बड़े तहजीब का शहर है तेरा
यहाँ "सर" कह कर लोग, घर में घर कर लेते है
मुझे भी सर छुपाने के लिए, इक सर बनाने दे ||

मै तेरे शहर में नया हूँ ..
इसकी आबो हवा में, मुझे घुल जाने दे ||

तेरे शहर के लोग बड़े अजीब है...
अपनों से दूर है , अजनबियों के करीब है॥||

यहाँ तारुफ़ करने का, तकल्लुफ कोई नहीं करता...|
क़ानून को हाथ में लेने से भी कोई नहीं डरता |
क्यूंकि जिस की जेब मैं जितना पैसा, उतना वो शरीफ है |
गरीबी का जुर्म माथे पे मेरे भी, अबकी मुझे भी शराफत कमाने दे ||

मै तेरे शहर में नया हूँ
इसकी आबो हवा में, मुझे घुल जाने दे

Friday, September 30, 2011

नारी की, नवरात्रा कब आएगी...


नौं दिन कन्याओं को, घर खाना खाने बुलातें है
और अध्जन्मी कन्या को, हम कूड़े में फेक आते है ||

एक नारी को ही हम, अम्बे, काली,दुर्गा, माता कहतें है
और बीच चौराहे, नारी की इज्जत लूट लेतें है ||

नौ दिन कन्याओं, की पूजा करतें है
पर उसे नौ महीने, गर्भ में नहीं सह्तें है
माता का मंदिर बनाते है,उसके दर्शन करने, पैदल चल कर जातें है
पर एक कन्या को , जन्म देने से घबरातें है ||

आप नौं दिन में पूजा कर के, किस माता को मना लोगे ?
गर कन्या नहीं रही धरती पर , तो क्या पुरूषों से काम चला लोगे ?
कन्याओं को मार के गर्भ में , कैसे माँ का आशीर्वाद पा लोगे ?
पाखंड की धार्मिक क्रियाओं से, कब तक समाज बचा लोगे ?

ना जाने "नारी की नवरात्रा" कब आएगी...
कब मंदिरों के बाहर, घर घर में नारी पूजी जायेगी ?
व्रत, उपवास, पूजा कर, उपरवाले को भरमातें है |
ऐसे रीती रिवाज़ और बनावटी समाज से , हम कतराते है
ऐसे ढोंगी समाज सुधारकों को, हम दूर से ही शीश नवातें है ||

नौं दिन कन्याओं को, घर खाना खाने बुलातें है
और अध्जन्मी कन्या को, हम कूड़े में फेक आते है ||

Friday, September 23, 2011

तेरे ग़मों में, डूब के लिखता हूँ...


मैं जब भी तेरे ग़मों में, डूब के लिखता हूँ
लोग कहते है ....वाह... क्या खूब लिखता हूँ ||
तेरे आंसुओं से, शब्दों को सींचा है
तेरे दर्द को दिल से समझा है
हर शब्द बयाँ करते है, खालिस सच्चाई
कोई साबित तो करें, की झूट लिखता हूँ !
मैं जब भी तेरे ग़मों में, डूब के लिखता हूँ
लोग कहते है ....वाह क्या खूब लिखता हूँ ||

मैं ग़मों का व्यापारी नहीं हूँ,
दांव लगाऊं तेरे दर्द का , कोई जुआँरी नहीं हूँ
मैं रोती रातों को "अमावस",खुशियों की कमी को "भूख" लिखता हूँ
अकेलेपन को "अँधेरा" , भीगी पलकों को, "गीली दूब" लिखता हूँ
किसी को अच्छा लगे या बुरा , मैं सिर्फ दो टूक लिखता हूँ
मैं जब भी तेरे ग़मों में, डूब के लिखता हूँ
लोग कहते है ....वाह क्या खूब लिखता हूँ ||

मेरी कविता की किताब के एक एक पन्ने
तुझे तेरी जिन्दगी का हिसाब देंगे ...
मेरे छंद देंगे, तुझे होंसला जीने का
शब्द तेरी आँखों पे, हसीं ख्वाब देंगे .. ||

तुम देती हो मेरे शब्दों को जीवन
मैं तेरे नाम अपना, "वजूद" लिखता हूँ
मैं जब भी तेरे ग़मों में, डूब के लिखता हूँ
लोग कहते है ....वाह क्या खूब लिखता हूँ ||
Related Posts with Thumbnails