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Monday, April 30, 2012

मजदूर या मजबूर दिवस



सर पर तगारी, या हाथ में फावड़ा 
हमेशा वो दिखा मुझे , धुप से लड़ता हुआ 
अपने से , चौगुना वजन लिए 
गर्म सडक पर नंगे पैर , सरपट बढ़ता हुआ | 
 
अपने पेट की अग्न को , शांत करने खातिर 
खुद से हमेशा लड़ता हुआ ..
वातानुकूलित भवनों में रहने वाले, लोकतंत्र से 
थोडा सहम थोडा डरता हुआ .. :(
इस महंगाई के महादानव से 
तिल तिल कर मरता हुआ |
हमेशा दिखा मुझे,  वो मजदुर , "मजबूर" 
मौत में जिन्दगी भरता हुआ ||

चाहें लग जाए सावन या चल रहा हो वसंत
पर हमेशा पतझड़ की तरह झरता हुआ |
मजदुर दिवस के दिन भी 
मजदूरी करता हुआ || 
मजदुर दिवस के दिन भी 
मजदूरी करता हुआ || 
 

2 comments:

Aparajita said...

sahi kaha.....Maut me Zindagi bharta hua mazdoor
:(

Rahul said...

चाहें लग जाए सावन या चल रहा हो वसंत
पर हमेशा पतझड़ की तरह झरता हुआ |
मजदुर दिवस के दिन भी
मजदूरी करता हुआ ||


Amazing it is...keep writing...

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