नौं दिन कन्याओं को, घर खाना खाने बुलातें है
और अध्जन्मी कन्या को, हम कूड़े में फेक आते है ||
एक नारी को ही हम, अम्बे, काली,दुर्गा, माता कहतें है
और बीच चौराहे, नारी की इज्जत लूट लेतें है ||
नौ दिन कन्याओं, की पूजा करतें है
पर उसे नौ महीने, गर्भ में नहीं सह्तें है
माता का मंदिर बनाते है,उसके दर्शन करने, पैदल चल कर जातें है
पर एक कन्या को , जन्म देने से घबरातें है ||
आप नौं दिन में पूजा कर के, किस माता को मना लोगे ?
गर कन्या नहीं रही धरती पर , तो क्या पुरूषों से काम चला लोगे ?
कन्याओं को मार के गर्भ में , कैसे माँ का आशीर्वाद पा लोगे ?
पाखंड की धार्मिक क्रियाओं से, कब तक समाज बचा लोगे ?
ना जाने "नारी की नवरात्रा" कब आएगी...
कब मंदिरों के बाहर, घर घर में नारी पूजी जायेगी ?
व्रत, उपवास, पूजा कर, उपरवाले को भरमातें है |
ऐसे रीती रिवाज़ और बनावटी समाज से , हम कतराते है
ऐसे ढोंगी समाज सुधारकों को, हम दूर से ही शीश नवातें है ||
नौं दिन कन्याओं को, घर खाना खाने बुलातें है
और अध्जन्मी कन्या को, हम कूड़े में फेक आते है ||