
मैंने मुर्दों कि बस्ती में, अपना घर बना लिया है ,
अपने हक कि आवाज़ को भी कब्र में दफना दिया है॥
चारों और जिन्दा लाशों से घिरा बैठा हूँ मैं
अपने ईमान को भी दीवारों में चुनवा दिया है
मैंने मुर्दों कि बस्ती में अपना घर बना लिया है॥
मेरी अंतरात्मा कि आवाज़ भी अब मेरे कानों तक नहीं आती
आँखे क्या खोलूं मैं, पीर मुझ से किसी कि देखी नहीं जाती ||
ये "लोकतंत्र" कुछ ही लोगो को आ रहा है रास
बाकी भारतीय तो भोग रहे है आजीवन वनवास ||
किस -किस को दोष दूँ मैं .. ..सब ने आज़ादी का तमगा लगा लिया है |
मैंने मुर्दों कि बस्ती में अपना घर बना लिया है॥
अपने हक कि आवाज़ को भी कब्र में दफना दिया है॥
न पक्ष को मेरी पड़ी है और न ही विपक्ष को मेरी पड़ी है
हर एक सफ़ेद पोश कि आँखों पे काली पट्टी चढ़ी है ॥
सफ़ेद कपडे वालों के दिल है कितने काले
दिख रहे है दूर तक घोटाले ही घोटाले
और जो थामने चला मैं लाल किले के तिरंगे को
जख्म से नासूर हो गये मेरे पैर के छाले
मैं सह रहा हूँ जीने का दर्द, इस दर्द को ही अब मैंने जीवन बना लिया है |
मैंने मुर्दों कि बस्ती में अपना घर बना लिया है ,
अपने हक कि आवाज़ को भी कब्र में दफना दिया है॥




