
बारिश के बाद कि सुबह ,थोड़ी भीगी सी , थोड़ी अलसाई सी
हरें पेड़ों कि पत्तियां थोड़ी खिली सी, थोड़ी मुरझाई सी ...
थोड़ी नमी सी दीवारों में , थोड़ी बूँदें किनारों में
थोड़ी सी मस्ती इशारों में, उड़ते परिंदे नजारों में
सूरज कि बाहें खुली खुली , हर एक कली इठलाई सी
बारिश के बाद कि सुबह ,थोड़ी भीगी सी , थोड़ी अलसाई सी ||
जारी है , बादलों का सूरज के साथ,अठखेलियाँ करना
गीले आँगन में हमारा , संभल संभल के चलना ...
टूटी छतों कि मरम्मत का दौर , कहीं से बहते पानी का शोर ||
अभी तक वो छोटी गिलहरी , पानी से कुछ सकुचाई सी
बारिश के बाद कि सुबह ,थोड़ी भीगी सी , थोड़ी अलसाई सी ||
बारिश के बाद कि सुबह , ना जाने क्यूँ आसमान , कुछ ज्यादा ही नीला सा है
पत्तों, पेड़ों , दीवारों , धरती के साथ, मन भी तो थोडा गीला सा है ||
सीली- सीली हवा के झोंके, ख्वाबों में भी कुछ सीलन सी ले आयें है..
गीली हरी दूब के अहसास को , हम अपना दिल दे आयें है...
देखो फिर एक बार , प्रक्रति ने हमसे, दोस्ती निभाई सी ...
बारिश के बाद कि सुबह ,थोड़ी भीगी सी , थोड़ी अलसाई सी ||