
मुझे चाँद में तू नजर नहीं आती आज कल
जब से उस गरीब को उसमें रोटी दिखाई दि है ||
मुझे फुहारों में तू नजर नहीं आती आज कल
जब से उस गरीब कि झोपडी, टूटी दिखाई दि है ||
तेरे इंतज़ार में लम्बी नहीं लगती रातें अब ...
जब से उसकी रातें , रोती दिखाई दि है ||
तेरे ख्वाब मेरी नींदे चुराते नहीं अब ..
जब से जिन्दगी फूटपाथ पे सोती दिखाई दि है ||
तेरा यौवन लुभाता नहीं मुझे अब
जब से उसकी फटी कुर्ती, छोटी दिखाई दि है ||
हसीं ख्वाब बेमानी लगने लगे है ...
जब से वो जिन्दगी खोती दिखाई दि है
मै ख्यालों में जी रहा था अब तक
जिन्दगी अब महसूस होती दिखाई दि है ||
मुझे चाँद में तू नजर नहीं आती आज कल
जब से उस गरीब को उसमें रोटी दिखाई दि है ||





